आज लगभग हर स्मार्टफोन यूजर के पास कभी न कभी स्पैम कॉल या फ्रॉड लिखा हुआ कॉल जरूर आता है. ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर किसी नंबर को स्पैम कौन बताता है? क्या यह मोबाइल कंपनी करती है या फिर कॉलर आईडी ऐप्स खुद यह फैसला लेती हैं? दरअसल, इसके पीछे कई तकनीकों और यूजर्स की रिपोर् काम करती है. इसलिए किसी नंबर पर स्पैम टैग अचानक नहीं लग जाता.
कॉलर आईडी ऐप्स जैसे Truecaller और दूसरी ऐसी ही सर्विस देने वाली कंपनी सबसे पहले अपने यूजर्स की रिपोर्ट पर भरोसा करती हैं. अगर ज्यादा लोग किसी नंबर को स्पैम, फर्जी या अनचाहा कॉल बताकर रिपोर्ट करते हैं, तो वह जानकारी ऐप के डेटाबेस में जुड़ जाती है. जब वही नंबर दूसरे लोगों को कॉल करता है, तो ऐप उसे स्पैम के रूप में दिखा सकती है. यानी जितनी ज्यादा शिकायतें, उतनी अधिक संभावना कि नंबर पर स्पैम टैग दिखाई दे.
स्पैम की पहचान केवल लोगों की शिकायतों से नहीं होती. कई ऐप्स यह भी जांचती हैं कि कोई नंबर बहुत कम समय में कितने लोगों को कॉल कर रहा है. अगर कोई नंबर लगातार हजारों अलग-अलग लोगों को कॉल कर रहा है और कई लोग उसे बिना रिसीव किए काट रहे हैं या ब्लॉक कर रहे हैं, तो सिस्टम उसे स्पैम मान सकता है. इसके बाद उस नंबर की निगरानी और बढ़ा दी जाती है.
आधुनिक कॉलर आईडी प्लेटफॉर्म आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बड़े डेटा (Big Data) का भी इस्तेमाल करते हैं. ये सिस्टम करोड़ों कॉल रिकॉर्ड के पैटर्न को एनालाइज करके यह समझने की कोशिश करते हैं कि कौन से नंबर टेलीमार्केटिंग, धोखाधड़ी या बार-बार अनचाहे कॉल करने में शामिल हो सकते हैं. इसी एनालिटिक्स के आधार पर कई नंबरों को स्पैम कैटेगरी में रख दिया जाता है.
हर बार स्पैम टैग पूरी तरह सही हो, ऐसा जरूरी नहीं है. कई बार किसी बिजनेस, बैंक या नए नंबर को भी लोग गलती से स्पैम रिपोर्ट कर देते हैं. ऐसे मामलों में नंबर पर गलत टैग लग सकता है. यदि किसी नंबर के बारे में बाद में पॉजिटिव जानकारी मिलती है या रिपोर्ट कम हो जाती हैं, तो कई प्लेटफॉर्म उस टैग को दोबारा देखता है.
अगर किसी अनजान नंबर पर स्पैम लिखा आता है, तो बिना जरूरत कॉल रिसीव करने से बचें. किसी भी कॉल पर बैंक डिटेल, OTP, PIN या पासवर्ड जैसी जानकारी कभी शेयर न करें. यदि आपको लगता है कि कोई नंबर वास्तव में फर्जी है, तो उसे ब्लॉक करें और रिपोर्ट भी करें.