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Summer Vacation Destinations: क्या आपको भी याद है गर्मियों की छुट्टियों का वह टाइम?... पांच ऐसी जगह, जहां घूमना हुआ करता था हर एक बच्चे का सपना

गर्मियों की छुट्टियां अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में हो जाती थीं. ये छुट्टियां लगभग 1 महीने से लेकर 45 दिनों की होती थीं. हालांकि हर साल हम प्लान करते थे कि इस बार यहां जाएंगे, वहां जाएंगे, लेकिन मां हमें लेकर जाती थीं नानी के घर. आइए चलते हैं वहां, जहां जाने का सपना हम में से कई लोगों ने एक बार तो अपने बचपन में जरूर देखा होगा.

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बचपन में नया सेशन शुरू होते ही हम स्लैवस के बारे में नहीं सोचते थे, बल्कि प्लान करते थे कि इस बार कहां घूमने जाना है. लेकिन हमारा प्लान सिर्फ प्लान ही रहता था, क्योंकि मां-पापा ने पहले ही सोच लिया होता था कि कहां जाना है. या यूं कहें कि हर साल नानी के घर जाना है, यह एक साल पहले ही तय हो चुका होता था.

गर्मियों की छुट्टियों के बाद जब टीचर क्लास में पूछती थीं, 'अपनी छुट्टियों के बारे में बताओ', तो बच्चे अलग-अलग जगहों के बारे में बताते थे और हम नानी के घर का जिक्र करते थे. हो सकता है कि उनमें से आधे बच्चे सच बोल रहे हों, लेकिन यह भी तय था कि 50 प्रतिशत बच्चे झूठ कह रहे होते थे. आइए याद करते हैं उन जगहों को, जहां जाना सबका सपना हुआ करता था.

पहाड़ों का अपना स्वर्ग मनाली 
किसी फिल्म में देखें और वहीं से, बर्फ से ढके पहाड़, रोहतांग पास की वादियां और हाथ में गर्म भुट्टा मन में बस गया था. मनाली उन बच्चों का सपना था जिन्हें फिल्मों में ही पहाड़ देखने मिलते थे. स्कूल में जिसने भी कहा 'मैं मनाली घूमकर आया हूं' उसकी इज्जत क्लास में बढ़ जाती थी और पूरा सेक्शन उसे एक दिन के लिए स्टार बना देता था.

क्वीन ऑफ हिल्स मसूरी
'मसूरी' नाम लेते ही जैसे दिमाग में एक ठंडी हवा का झोंका आ जाता था. हालांकि उस वक्त पता भी नहीं था कि मसूरी कहां है, लेकिन फिल्म में सुन और देख रखा था. हर मिडिल-क्लास बच्चा बोलता था 'इस बार मसूरी ले चलना ना पापा…' पापा भी कह देते थे ठीक है, लेकिन मसूरी का यह रास्ता कैसे नानी के घर चला जाता था कभी पता भी नहीं चला.

झील का शहर नैनीताल 
'हाथ में कॉर्न, झील में बोटिंग, और दूर पहाड़ों में ढलता सूरज…' उस वक्त फिल्म आई थी 'चांद के पार चलो' जहां से नैनीताल का नाम मन में बस गया. नैनीताल का ट्रिप तो हर बच्चे की समर हॉलिडे बकेट लिस्ट में टॉप पर था. क्लास में जिसने बोला कि वह बोटिंग कर आया है, हम सब बच्चे मिल कर सीधे उसे 'समर वेकेशन गोल्ड मेडल' दे देते थे.

टॉय ट्रेन की जादुई दुनिया में बसा दार्जिलिंग
अगर बचपन में कभी गर्मियों की छुट्टियों की बातें होती थीं, तो दार्जिलिंग का नाम आते ही हमें सबसे पहले जिस चीज की याद आती थी वो थी टॉय ट्रेन. एक छोटी-सी, नीली रंग की प्यारी ट्रेन जो धीरे-धीरे पहाड़ की गोद में चढ़ती थी. 

एक फिल्म में राजेश खन्ना को टॉय ट्रेन के आस-पास गाना गाते देखा था, तब से यह जगह कई बच्चों के जहन में बस गया था. सपना था कि एक बार यहां जरूर जाना है. दार्जिलिंग की यही टॉय ट्रेन बच्चों के लिए सिर्फ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि वह एक जादुई दुनिया थी.

भले उस वक्त नानी के वहां जाना आम लगता हो, लेकिन आज कई लोगों के लिए वहां जाना भी एक सपने सा हो गया है. कुछ लोग जीवन में इतने व्यस्त है कि उन्हें टाइम नहीं मिल रहा, तो किसी के पास टाइम है पर उनके पास अब नानी नहीं है. खैर जो भी हो, आज समझ आ रहा है कि नानी के वहां बीती छुट्टियां दुनिया भर की खुशियों से कहीं ज्यादा थी. 

 

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