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अमेरिका को मिला पहला मुस्लिम सीनेटर, अब्दुल अल-सैयद की जीत का कर्नाटक से है खास कनेक्शन... जानें पत्नी सारा की कहानी

अब्दुल अल-सैयद ने अमेरिका में पहला मुस्लिम सीनेटर बनकर इतिहास रच दिया है. जानिए उनकी पत्नी सारा जुकाकू का कर्नाटक के भटकल से क्या है खास रिश्ता.

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अमेरिका में हुए 2026 के मिडटर्म चुनाव में अब्दुल अल-सैयद ने इतिहास रच दिया है. मिशिगन से डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार अब्दुल अल-सैयद ने रिपब्लिकन पार्टी के माइक रोजर्स को हराकर अमेरिकी सीनेट का चुनाव जीत लिया है. इस जीत के साथ वह अमेरिका की सीनेट में पहुंचने वाले पहले मुस्लिम बन गए हैं. उनकी इस जीत की चर्चा भारत में भी हो रही है. इसकी वजह उनकी पत्नी सारा जुकाकू का भारत से खास रिश्ता है. चलिए बताते हैं कि क्या कनेक्शन हैं अब्दुल अल-सैयद की पत्नी का भारत से.

कौन हैं सारा जुकाकू?

अब्दुल अल-सैयद की पत्नी का नाम डॉ. सारा जुकाकू है. उनका जन्म अमेरिका के मिशिगन में भारतीय मूल के माता-पिता के घर हुआ था. हालांकि, उनके परिवार की जड़ें भारत के कर्नाटक राज्य के भटकल शहर से जुड़ी हैं. यह शहर मंगलुरु से करीब 140 किलोमीटर दूर है. सारा के पिता डॉ. जुकाकू एस. तैयब का बचपन भटकल में बीता है. वह किडनी के डॉक्टर हैं. इस तरह अब्दुल अल-सैयद की जीत के बाद कर्नाटक का भटकल शहर भी चर्चा में आ गया है.

पति-पत्नी दोनों हैं डॉक्टर

सारा जुकाकू खुद भी पेशे से डॉक्टर हैं. उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की है. वह मानसिक स्वास्थ्य की डॉक्टर यानी मनोचिकित्सक हैं. उन्होंने मिशिगन मेडिसिन में कई साल तक काम किया. इसके बाद साल 2024 में उन्होंने अपना क्लीनिक शुरू किया, जिसका नाम माइंड वर्क साइकियाट्री है. सारा राजनीति से दूर रहकर मेडिकल क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं. वह मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों को जागरूक करने के काम से भी जुड़ी हुई हैं.

अब्दुल अल-सैयद और सारा जुकाकू की मुलाकात यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में पढ़ाई के दौरान हुई थी. दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई और साल 2006 में दोनों ने शादी कर ली. इस शादी से उनकी दो बेटियां हैं, जिनका नाम एमीली और सेरीन है.

सारा ने महिलाओं के हक के लिए भी लड़ी लड़ाई

सारा की जिंदगी में एक ऐसा समय भी आया, जब पहली बेटी के जन्म के बाद उन्हें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ा. इस दौरान उन्होंने अस्पताल से मेडिकल छुट्टी मांगी, लेकिन उन्हें काफी मुश्किलें हुईं. बाद में फिजिशियन यूनियन ने उनका साथ दिया और छुट्टी के अधिकार के साथ नौकरी की सुरक्षा दिलाने में मदद की. उनकी इस लड़ाई से दूसरी महिलाओं को भी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रेरणा मिली.