कैंसर की सर्जरी के बाद जीभ का ज्यादातर हिस्सा खो देने वाली 30 साल की डॉक्टर इमोजेन ब्रूक्स की जिंदगी आर्टिफिशियल जीभ ने बदल दी. ब्रिटेन की NHS टीम ने उनके लिए पहली बार ऐसी आर्टिफिशियल जीभ तैयार की, जो उनके दांतों पर फिट होती है. इसका मकसद सिर्फ जीभ का आकार पूरा करना नहीं, बल्कि बोलते समय मुंह के अंदर सही जगह संपर्क बनाकर ज्यादा से ज्यादा आवाजें निकालने में मदद करना है.
26 साल की उम्र में जीभ के कैंसर का पता चला
डॉ. ब्रूक्स को 26 साल की उम्र में जीभ पर स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा, यानी एक तरह का स्किन कैंसर, हुआ था. शुरुआत में उनके लक्षण बहुत हल्के थे. उन्हें लगा कि कहीं वह छोटी-सी परेशानी को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता तो नहीं कर रही हैं. लेकिन डॉक्टर से जांच कराने पर कैंसर का पता चला. करीब तीन साल पहले हुई सर्जरी में उनकी जीभ का ज्यादातर हिस्सा निकालना पड़ा. बाद में रेडियोथेरेपी के कारण जीभ के दोबारा बनाए गए ऊतक भी सिकुड़ गए. इससे उनकी बोलने की क्षमता प्रभावित हुई.
लोग डरकर देखते थे
सर्जरी के बाद डॉ. ब्रूक्स की आवाज पहले से बेहतर हुई, लेकिन बातचीत करना उनके लिए आसान नहीं था. फोन पर उन्हें स्पीच असिस्टेंस तकनीक की मदद लेनी पड़ती थी. कई बार जब वह पहली बार किसी से बात करती थीं तो सामने वाला उन्हें डर या हैरानी से देखता था. कुछ लोग उनकी बात समझ नहीं पाते थे. इसका असर उनकी सामाजिक जिंदगी पर भी पड़ा. वह कई बार लोगों से बातचीत करने के बजाय अकेले रहना पसंद करने लगीं.
दांतों पर फिट होने वाली जीभ बनाई
डॉ. ब्रूक्स ने खुद आर्टिफिशियल जीभ के बारे में रिसर्च की और अपने डॉक्टरों से पूछा कि क्या वह इसके लिए सही उम्मीदवार हो सकती हैं. इसके बाद Guy's and St Thomas' NHS Foundation Trust में डॉक्टरों, डेंटिस्ट और डेंटल टेक्नीशियन की टीम बनाई गई. टीम ने उनके लिए एक खास आर्टिफिशियल जीभ तैयार की. इसका बेस कोबाल्ट-क्रोम से बना U-शेप फ्रेम है, जो नीचे के दांतों पर क्लिप हो जाता है. इसके साथ सिलिकॉन की एक जीभ लगाई गई है, जिसका आकार खास तौर पर डॉ. ब्रूक्स के मुंह के अनुसार तैयार किया गया.
आर्टिफिशियल जीभ का इस्तेमाल शुरू करने के करीब तीन दिन बाद ही डॉ. ब्रूक्स को अपनी बोलने की क्षमता में सुधार महसूस होने लगा. वह लंबे वाक्य बिना बीच में सांस लिए बोल पाती हैं और उन्हें हर शब्द बोलने के तरीके के बारे में ज्यादा सोचना नहीं पड़ता.
दादी से बातचीत हुई आसान
इस आर्टिफिशियल जीभ का सबसे भावुक असर उनकी दादी के साथ बातचीत में दिखा. उनकी दादी को सुनने में परेशानी है. पहले बातचीत के दौरान डॉ. ब्रूक्स को हाथों के इशारे करने और कई बार लिखकर समझाने की जरूरत पड़ती थी. लेकिन कृत्रिम जीभ लगाने के बाद उनकी दादी उनकी बात काफी आसानी से समझ सकीं. डॉ. ब्रूक्स के मुताबिक अब बातचीत ज्यादा सहज है और बोलने में थकान भी कम होती है.
डॉक्टर की पढ़ाई में भी मिली मदद
डॉ. ब्रूक्स के कैंसर के दोबारा लौटने के फिलहाल कोई संकेत नहीं हैं. वह King's College London में त्वचा रोगों के इलाज से जुड़ी डॉक्टरेट की पढ़ाई कर रही हैं. खास बात यह है कि नई कृत्रिम जीभ की मदद से वह अपना ओरल एग्जाम भी पास कर सकीं. सर्जरी के तुरंत बाद ही उन्होंने अपनी स्पीच थेरेपिस्ट से कहा था कि वह अपनी बोलने की क्षमता को जितना संभव हो, उतना बेहतर करना चाहती हैं.
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