मानव का जीवन जुड़ने और टूटने से चलता है. जुड़ने के पीछे राग होता है और टूटने के पीछे विराग, इसी विराग को वैराग्य कहा जाता है. हर तरह के सांसारिक सुखों से दूर जाने का भाव वैराग्य कहा जाता है. यह व्यक्ति को जीवन में रहकर भी जीवन से मुक्ति का लाभ देता है. बिना इस भाव के ईश्वर की उपलब्धि की ही नहीं जा सकती.
किन ग्रहों की भूमिका होती है वैराग्य में
वैराग्य के लिए आम तौर पर नकारात्मक ग्रहों की भूमिका होती है. शनि, राहु और केतु, इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं. इसके अलावा खराब चन्द्रमा भी वैराग्य पैदा करता है. कुंडली का चतुर्थ, अष्टम और द्वादश भाव वैराग्य भाव को मजबूत करता है. जल और अग्नि की राशियां वैराग्य की प्रचंड राशियां मानी जाती हैं.
कब व्यक्ति वैराग्य का वरदान पाता है और हो जाता है वैरागी
कुंडली में चन्द्रमा के खराब होने पर, चन्द्रमा का सम्बन्ध चतुर्थ, अष्टम या द्वादश भाव से होने पर, नवम भाव के स्वामी के मजबूत होने पर, केतु के प्रभावशाली होने पर, अमावस्या या पूर्णिमा का जन्म होने पर.
कब व्यक्ति वैराग्य का मार्ग छोड़ देता है
शुक्र की भूमिका मजबूत होने पर, कुंडली का तृतीय, सप्तम या एकादश भाव मजबूत होने पर, चन्द्रमा के द्विस्वभाव में होने पर, कुंडली में वायु तत्व के मजबूत होने पर, राहु का सम्बन्ध शुभ ग्रहों से होने से.
वैराग्य के लिए क्या करें
नियमित रूप से ईश्वर से प्रार्थना करें. संगति, खान पान और सोच का ध्यान रखें. जब भी समय मिले, कीर्तन अवश्य करें. एक दिन में ही चमत्कार की आशा न करें. असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं, अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते.
क्या संन्यास में घर द्वार का त्याग करना है आवश्यक
सन्यास का अर्थ है, मन को सत्य वस्तुओं में न्यस्त रखना. यह स्थिति परिवार में रहकर भी आ सकती है. निरंतर अभ्यास और वैराग्य से व्यक्ति कहीं भी संन्यास की स्थिति में आ सकता है. यदि ध्यान या पूजा में मन गहराई से नहीं लगता तो पूजा के समय भगवा वस्त्र धारण कर लें.