जनवरी 2026 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने ने 5,595 डॉलर प्रति औंस का नया ऑल-टाइम हाई बनाया था. लेकिन इसके बाद बाजार की चाल बदली और मिडिल ईस्ट में संघर्ष के बावजूद सोने की कीमतों में दबाव देखने को मिला. अब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना अपने उच्चतम स्तर से करीब 30 फीसदी टूटकर 4,000 डॉलर से नीचे आ चुका है. इसी वजह से निवेशकों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या आगे इसमें और बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है.
क्यों लग रहे हैं बड़ी गिरावट के अनुमान?
तकनीकी विश्लेषकों का मानना है कि पिछले एक साल में सोने में जितनी तेजी आई, वह सामान्य गति से कहीं ज्यादा थी. बाजार का एक पुराना सिद्धांत कहता है कि जब किसी एसेट की कीमतें अपने ऐतिहासिक औसत से बहुत ऊपर चली जाती हैं, तो समय के साथ उनमें करेक्शन देखने को मिल सकता है. इसी आधार पर कुछ विश्लेषक आगे भी कमजोरी की संभावना जता रहे हैं.
भारत में असर दुनिया जितना क्यों नहीं दिखता?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में बड़ी गिरावट आने के बावजूद भारत में कीमतें उसी अनुपात में कम नहीं होतीं. इसकी सबसे बड़ी वजह डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और सोने पर लगने वाले आयात शुल्क व अन्य टैक्स हैं. यही कारण है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 40 फीसदी तक भी गिर जाए, तो भारतीय बाजार में इसकी गिरावट आमतौर पर करीब 15 से 20 फीसदी तक ही सीमित रह सकती है. यानी वैश्विक बाजार की पूरी गिरावट सीधे भारतीय ग्राहकों तक नहीं पहुंचती.
ऑल-टाइम हाई से कितना नीचे आ चुका है सोना?
जनवरी में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद सोना 25 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है. फिलहाल 24 कैरेट सोने का भाव लगभग 1.41 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास बना हुआ है. इसके बावजूद बाजार में राय एक जैसी नहीं है. कुछ विशेषज्ञों को अभी भी बड़ी गिरावट की आशंका है, जबकि कई बड़े संस्थानों का मानना है कि सोना पूरी तरह नहीं टूटेगा.
क्या 50 फीसदी तक गिर सकता है सोना?
यही सबसे बड़ा सवाल है. कुछ विश्लेषकों और ट्रेडिंग एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस साल के अंत तक सोना 2,780 डॉलर प्रति औंस तक जा सकता है. अगर ऐसा होता है तो यह जनवरी 2026 के ऑल-टाइम हाई से लगभग 50 फीसदी नीचे का स्तर होगा.
हालांकि सभी विशेषज्ञ इस राय से सहमत नहीं हैं. कई बड़े वैश्विक निवेश संस्थानों का मानना है कि सोने के लिए 3,800 से 4,000 डॉलर प्रति औंस के बीच मजबूत सपोर्ट मौजूद है. उनके अनुसार इस स्तर से नीचे बड़ी और लगातार गिरावट की संभावना फिलहाल कम है.
इतिहास क्या कहता है?
जो विशेषज्ञ 50 फीसदी तक गिरावट की बात कर रहे हैं, वे मुख्य रूप से दो ऐतिहासिक दौर का हवाला देते हैं, 1980 और 2011-2015. हालांकि इतिहास यह भी बताता है कि ऑल-टाइम हाई के बाद हर बार इतनी बड़ी गिरावट नहीं आई. कई बार कीमतों में केवल 20 से 30 फीसदी की कमजोरी के बाद फिर स्थिरता भी देखने को मिली है.
1980 की ऐतिहासिक गिरावट
जनवरी 1980 में ईरान संकट और अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले के बाद वैश्विक महंगाई चरम पर पहुंच गई थी. इस माहौल में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 850 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था.
इसके बाद महंगाई पर नियंत्रण पाने के लिए अमेरिका के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी करते हुए उन्हें करीब 20 फीसदी तक पहुंचा दिया. ऊंची ब्याज दरों के बाद सोने की चमक फीकी पड़ने लगी और 1982 से 1985 के बीच इसकी कीमतें घटकर लगभग 300 से 350 डॉलर प्रति औंस तक आ गईं. यह अपने ऑल-टाइम हाई से 60 फीसदी से अधिक की गिरावट थी.
2011 से 2015 तक भी आई थी बड़ी मंदी
साल 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के बाद सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग तेजी से बढ़ी. इसी वजह से सितंबर 2011 में सोना करीब 1,920 डॉलर प्रति औंस तक रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया.
लेकिन जैसे-जैसे अमेरिकी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार होने लगा, निवेशकों ने सोने से पैसा निकालकर दूसरे निवेश विकल्पों की ओर रुख करना शुरू किया. इसका असर यह हुआ कि दिसंबर 2015 तक सोने की कीमत गिरकर करीब 1,050 डॉलर प्रति औंस रह गई, जो उसके रिकॉर्ड स्तर से लगभग 45 फीसदी नीचे थी.
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