Success Story: कभी रिक्शा चलाया, सब्जी बेची और आज हैं करोड़ों की कंपनी के मालिक, जानिए 'स्टार्टअप किंग' दिलखुश कुमार की कहानी

रतन टाटा से प्रेरणा लेने वाले 12वीं पास दिलखुश कुमार आज बिहार में स्टार्टअप किंग के नाम से जाने जाते हैं. पहले ‘आर्या गो कैब’ की शुरुआत की और अब रोडबेज के जरिए पूरे बिहार के टैक्सी उद्योग को बदलने की बात कर रहे हैं. रिक्शा चलाने से लेकर सब्जी बेचने तक का काम करने वाले दिलखुश की कहानी संघर्षों से भरी है. लेकिन आज वो जिस मुकाम पर हैं वह एक मिसाल है.

RodBez Founder CEO Dilkhush Kumar & Team
केतन कुंदन
  • नई दिल्ली,
  • 03 अप्रैल 2023,
  • अपडेटेड 4:31 PM IST
  • कस्टमर को हर राइड पर कम से कम 1500 रुपए बचा रहे हैं
  • एक ड्राइवर महीने में कमा सकता है 55 से 60 हजार रुपए

कहते हैं कि इंसान अगर ठान ले तो क्या कुछ नहीं कर सकता. चाहे हालात कितने भी बुरे हो, वह सफलता की कहानी लिख डालता है. अलाम्मा इक़बाल ने लिखा है कि ‘ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है’. इसे बिल्कुल सही साबित किया है बिहार के एक छोटे से गांव के दिलखुश कुमार ने. कभी रिक्शा चलाने और सड़क पर सब्जी बेचने वाले दिलखुश आज करोड़ों की कैब कंपनी रोडबेज़ (RodBez) के फाउंडर और सीईओ हैं. दिलखुश ने बस 12वीं तक की पढ़ाई की लेकिन आज उनकी कंपनी में IIT और IIM जैसे बड़े संस्थानों से पढ़े छात्र नौकरी कर रहे हैं. दिलखुश कुमार ने अपने इस सफर के बारे में जीएनटी डिजिटल से खास बातचीत की. इस बातचीत में दिलखुश ने न सिर्फ अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात की बल्कि बताया कि कैसे वो अपने स्टार्टअप के जरिए पूरे बिहार में कैब सर्विस में क्रांति लाने की सोच रहे हैं.  

रोडबेज़ क्या है और कैसे काम करती है ? 

सहरसा जिले के छोटे से गांव बनगांव से आने वाले दिलखुश इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं कि रोडबेज़ एक डेटाबेस कपंनी है. जिसका काम है पूरे बिहार में टैक्सी सर्विस प्रोवाइड करना. लेकिन यह ओला, उबर या इस तरह की कंपनियों से काफी अलग है. ये फ़िलहाल ऑउटस्टेशन यानी 50 किमी से ज्यादा जो कस्टरमर जाना चाहते हैं उनको सर्विस दे रहे हैं. आगे छोटे राइड का भी प्लान है. एक तरफ ओला उबर जहां कस्टमर से दोनों तरफ का किराया लेती है लेकिन रोडबेज़ एक साइड का किराया लेती है.

जब दिलखुश से पूछा गया कि रोडबेज काम कैसे करती है तो वह कहते हैं कि पूरे बिहार में जितने एग्रीगेटर काम कर रहे हैं, जितने टूर और ट्रेवल्स वाले काम कर रहे हैं और जितने इंडिविजुअल टैक्सी वाले काम कर रहे हैं उनको अपने कम्यूनिटी में लाते हैं और उन्हें कहते हैं कि आप जिस तरफ पैसेंजर लेकर जा रहे हो वो हमें बता दो. उधर से आप खाली आओगे, ऐसे में आते वक्त हम आपको ऐसे लोगों से मिला देंगे जिनको आपके रूट पर ट्रेवल करना होगा.

दिलखुश बताते हैं कि इससे सबसे बड़ा फायदा कस्मटर को हो रहा है. टैक्सी का किराया 40% तक कम हो गया है. पहले जो किराया 4000 रुपए तक जाता था वो अब 2200 से 2400 रुपए तक सिमट गया है. कस्टमर को हर राइड पर कम से कम 1500 रुपए बचा रहे हैं.

रोडबेज (RodBez) की शुरुआत कैसे हुई

इस सवाल के जवाब में दिलखुश कहते हैं कि मेरा अनुभव ड्राइविंग फील्ड में ही रहा है. पहले मैंने आर्या गो कैब की शुरुआत की और वो बिहार में अच्छा बिजनेस कर रही है. लेकिन फिर आइडिया रोडबेज कॉन्सेप्ट का आया और मैंने आर्या गो छोड़ दिया. रोडबेज की जब शुरुआत मैंने की तो उस समय मेरे पास एक बस सेकंड हैंड नैनो कार थी और उसी से मैंने रोडबेज की शुरुआत की. दिलखुश बताते हैं कि 6 से 7 महीने में 4 करोड़ की वैल्यूएशन पर हमने फंडिंग रेज की है और इतने ही समय में सवा लाख लोगों ने हमारे प्लेटफॉर्म को विजिट किया है. यह आंकड़ा  बताता है कि हम बिहार में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. बिहार में काफी संभावनाएं है और हमें अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. हम रोडबेज को अगले 6 महीने में 20 करोड़ तक लेके जाने वाले हैं और फिर हमारा टारगेट 100 करोड़ की वैल्यूएशन का होगा.

बिहार के किन-किन शहरों में रोडबेज की सर्विस है ?

दिलखुश कहते हैं कि पटना से बिहार के हर एक गांव तक और हर एक गांव से पटना तक की सर्विस फ़िलहाल हम पहले फेज में दे रहे हैं. दूसरे फेज में शहर से शहर को जोड़ेंगे. हमारा विजन ही यही है कि बिहार के हर एक गांव को टैक्सी से जोड़ दें. अभी बिहार पर फोकस है आगे चलकर हम बिहार से बाहर भी सर्विस को एक्सपैंड करेंगे.

पैसेंजर की सेफ्टी को कैसे ध्यान में रखते हैं ?

दिलखुश बताते हैं कि जो भी ड्राइवर रोडबेज से जुड़ता है सबसे पहले हम उसका डॉक्यूमेंट वेरीफाई करते हैं फिर केवाईसी करते हैं. अब हम आधार ऑथेंटिकेशन की शुरुआत करने जा रहे हैं. इसके बाद सबसे पहले आधार ऑथेंटिकेट करेंगे तभी ड्राइवर की आईडी एक्टिवेट करेंगे. हम सेफ्टी को पहले नंबर पर रखते हैं. 

'रोडबेज से जुड़कर ड्राइवर महीने में कमा सकता है 55 से 60 हजार' 

दिलखुश कहते हैं कि हमारी कंपनी ड्राइवरों की जिंदगी को समझती है. चूंकि मैं इसी प्रोसेस से गुजर कर यहां तक पहुंचा हूँ तो ड्राइवर की कमाई ज्यादा से ज्यादा हो सके इसका भी ध्यान रखते हैं. दिलखुश बताते हैं की एक ड्राइवर महीने का 55 से 60 हजार रुपए तक कमा सकता है.  

IIT गुवाहाटी से हायर किया एम्प्लॉई

दिलखुश बताते हैं कि मेरी टीम में IIT और IIM से पढ़े लोग काम कर हैं. आईआईटी मंडी ने हमें प्लेसमेंट के लिए इनवाइट किया था लेकिन हमने आईआईटी गुवाहाटी से एम्प्लॉई हायर किया. दिलखुश से जब पूछा गया कि इतने बड़े सस्थान से पढ़े छात्रों को अपनी कंपनी में काम करने के लिए कैसे राजी करते हैं. क्योंकि अभी स्टार्टअप इयरली स्टेज में है और आप बस 12वीं पास है तो IIT वाले कैसे राजी हो जाते हैं. इस सवाल का जवाब देते हुए दिलखुश थोड़ा मुस्कुराते हैं और कहते हैं कि राजी करना मुश्किल तो है. लेकिन उनको मेरे आइडिया पर भरोसा हो जाता है. और जो मेरी टीम में लोग काम कर रहे हैं उनके अंदर भी कभी ये भावना नहीं आई कि 12वीं पास के नीचे मैं कैसे काम करूं. दिलखुश का कहना है कि आईआईएम के कुछ स्टूडेंट भी उनके स्टार्टअप के साथ पार्टटाइम के तौर पर जुड़े हुए हैं.
  
बिहार सरकार स्टार्टअप को कितना सपोर्ट करती है ?

दिलखुश इस सवाल का जवाब देते हुए कहते हैं कि सरकार सपोर्ट करती है. 10 से 12 लाख रुपए का फंड मिलता है. लेकिन हमने इसका बेनिफिट नहीं लिया है. जो छोटे-छोटे स्टार्टअप हैं, जिनको अपने आइडिया को जमीन पर उतारना है वो फंड ले सकते हैं. अभी रोडबेज को इन्वेस्टर से 50 हजार डॉलर की फंडिंग मिली है, जिसका इस्तेमाल हम सप्लाई चेन और एम्प्लोयी की संख्या को बढ़ाने में करेंगे. 

दिल्ली में रिक्शा चलाया, पटना में सब्जी बेची

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए दिलखुश थोड़ा इमोशनल हो जाते हैं और कहते हैं कि मैंने दिल्ली में रिक्शा चलाया. पटना में सड़क पर सब्जी बेची. एक चपरासी की नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया तो वहां मुझे देहाती और गंवार समझ लिया गया. और मुझे आईफोन का लोगो पहचानने को कहा गया. मैं नहीं पहचान पाया क्योंकि मैं आईफोन पहली बार देख रहा था. जो भी वजह रही हो लेकिन मुझे चपरासी तक की नौकरी नहीं मिली. लेकिन मैं रुका नहीं. क्योंकि शादी हो चुकी थी तो जिम्मेदारी को निभाना था. ऐसे में कुछ न कुछ करते रहना था. 

पिताजी बस चालक का करते थे काम

दिलखुश कहते हैं कि जब कहीं नौकरी नहीं मिली तो अपने पिताजी से ड्राइविंग सीखी. वो बस चलाते थे. हालांकि वो नहीं चाहते थे कि मैं भी ड्राइविंग करूं. लेकिन मुझे नौकरी नहीं मिली तो मजबूरन ड्राइविंग शुरू की. जब दिलखुश से पूछा गया कि आपने 12वीं तक की पढाई ही क्यों की. तो वह बताते हैं कि पिताजी ड्राइविंग करते थे, उनके पास इतने पैसे नहीं होते थे कि अपनी पढ़ाई को आगे जारी रख सकूं. लेकिन आज ड्राइविंग करके ही जो मैंने किया है इससे वो बहुत खुश हैं.

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