Parenting Tips: जापान के बच्चे इतने अनुशासित क्यों होते हैं? जान लें ये सीक्रेट फॉर्मूला

भारत में पैरेंटिंग अलग तरीके से होती है. आजकल बच्चों की पढ़ाई पर जोर दिया जाता है. छोटे बच्चों को खुद कुछ करने नहीं दिया जाता है. लेकिन जापान में ऐसा नहीं है. जापान में बच्चों को सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है. उनको कई काम खुद ही करने दिया जाता है, ताकि उनमें आत्मविश्वास और जिम्मेदारी पैदा हो.

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gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 11 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:23 PM IST

बच्चों की सही तरीके से परवरिश करना बहुत जरूरी होता है. अलग-अलग देशों या अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से बच्चों की परवरिश होती है. हर कोई चाहता है कि उनके बच्चे सर्वागीण विकास हो. पैरेंट्स इसके लिए तरह-तरह से उपाय करते हैं. आपने कई जगह सुना होगा या देखा होगा कि जापान के बच्चे बहुत ही अनुशासित, शांत और आत्मनिर्भर होते हैं. लेकिन ऐसा क्यों होता है? इसके पीछे पैरेटिंग का कमाल छिपा है. चलिए हम जापान में पैरेटिंग के जादुई सीक्रेट फॉर्मूले को डिकोड करते हैं.

जापान का शित्सुके फॉर्मूला-
जापानी संस्कृति में 'शित्सुके' नाम का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है. इसका मतलब होता है सजा देने के बजाय अच्छी आदतें और जरूरी स्किल्स सिखाना. अगर बच्चा कोई गलती करता है, तो उसे खराब व्यवहार या बुरे संस्कार के रूप में नहीं देखा जाता. बल्कि माना जाता है कि बच्चे ने अभी वह स्किल सीखी नहीं है. अगर कोई बच्चा गुस्सा करता है तो उसे चुप नहीं कराया जाता. बल्कि उसे गहरी सांस लेने, उसकी भावनाओं को समझना और शांत होना सिखाया जाता है.

मेमा मोरू क्या है?
जापानी में पैरेंटिंग का एक अहम हिस्सा 'मेमा मोरू' है. इसका मतलब दूर से नजर रखना है. इसमें माता-पिता हर छोटी परेशानी में तुरंत मदद करने के बजाय बच्चों को खुद कोशिश करने का मौका देते हैं. जापान में माना जाता है कि छोटे-छोटे संघर्ष से बच्चे में आत्मविश्वास पैदा होता है.

अमाए फॉर्मूला क्या है?
जापानी में पैरेंटिंग का एक अहम हिस्सा 'अमाए' भी है. इसका मतलब सुधार से पहले भावनात्मक जुड़ाव बनाना है. इसे उदाहरण से समझ सकते हैं. अगर बच्चा रोता है तो उसकी भावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उससे पूछा जाता है कि वो कैसा महसूस कर रहा है?

घर में छोटे-छोटे काम कराए जाते हैं-
जापान में बच्चों को छोटी उम्र से ही घर के छोटे-छोटे कामों की जिम्मेदारी भी दी जाती है. जैसे अपने जूते सही जगह रखना, खिलौने समेटना. खास बात यह है कि इन कामों के लिए न इनाम मिलता है और न ही सजा दी जाती है. इससे बच्चों के अंदर जिम्मेदारी की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित होती है. माना जाता है कि इससे बच्चे सीखते हैं और भविष्य में कोई भी काम करने में झिझकते नहीं हैं.

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