3 मई को हुई नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द होते ही लाखों छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं. पेपर लीक को लेकर हो रही जांच के बीच छात्रों के सामने अब एक नया संकट खड़ा हो गया है. दरअसल, 3 मई को एग्जाम खत्म होने के बाद ऐसे कई छात्र जो दूसरे शहरों से भोपाल आकर पढ़ रहे थे वो अपने घर लौट गए थे. लेकिन जैसे ही एनटीए ने परीक्षा रद्द करने का आदेश जारी किया वैसे ही कोचिंग और हॉस्टल संचालकों के फोन बजने लगे. अब छात्र दोबारा लौट रहे हैं, लेकिन इस बार सिर्फ किताबों का बोझ नहीं साथ में आर्थिक और मानसिक तनाव भी लेकर.
री-नीट की तैयारी के लिए फिर से हॉस्टल, पीजी, कोचिंग और इसके साथ फिर खर्चों का लंबा हिसाब शुरू हो गया. एक छात्र को मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी में पहले ही ढाई से तीन लाख रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं. लेकिन अब री-एग्जाम की वजह से एक से डेढ़ महीने के अतिरिक्त खर्च ने परिवारों की कमर तोड़ दी है. हॉस्टल, पीजी या किराए के रूम से लेकर खाना और ट्रांसपोर्ट पर हजारों रुपए अतिरिक्त खर्च होने वाले हैं
छात्रों के सामने आर्थिक तंगी
सागर जिले के खुरई की रहने वाली कार्तिका पिछले दो साल से हॉस्टल में रहकर तैयारी कर रही थीं. एग्जाम खत्म होने के बाद घर लौट गईं लेकिन नीट रद्द होते ही दोबारा वापस आना पड़ा. इस बीच उनका पुराना हॉस्टल रूम किसी और को मिल चुका था. अब 15 हजार रुपए किराए पर फ्लैट लेना पड़ा है. पहले कोचिंग पास थी अब रोज बस से आना-जाना पड़ता है. मेस सुविधा खत्म तो खाना खुद बनाना पड़ रहा है यानी एक नया खर्चा. कार्तिका कहती हैं 'मेंटली बहुत टेंशन हो गया है ऊपर से फिर एग्जाम देना है.'
लोन लेकर बेटी की कोचिंग फीस
खंडवा की रहने वाली प्रिया की कहानी भी बहुत अलग नहीं. 2 साल से भोपाल में रहकर नीट की तैयारी कर रही प्रिया के लिए यह आखिरी मौका था. पिता पेंटर हैं, लोन लेकर बेटी की कोचिंग फीस और भोपाल में रहने का खर्च उठाया. लेकिन अब दोबारा किराए के मकान में रहना, खाना और तैयारी का खर्च पूरे परिवार पर भारी पड़ रहा है. प्रिया को डर है कि कहीं उसका सपना परिवार की आर्थिक मजबूरी में न दब जाए.
हालांकि कोचिंग संस्थानों का दावा है कि छात्रों की तैयारी अभी भी मजबूत है. नीट की पढ़ाई करने वाले अमित गुप्ता का कहना है कि परीक्षा को सिर्फ 9 दिन हुए हैं इसलिए स्टूडेंट्स का रिदम पूरी तरह टूटा नहीं है. री-नीट देने वाले बच्चों से अतिरिक्त पढ़ाई का चार्ज नहीं लिया जाएगा. लेकिन असली चुनौती अब भी रहने और खर्च की है क्योंकि जिन बच्चों ने हॉस्टल खाली कर दिए थे, वहां अब दूसरे स्टूडेंट्स आ चुके हैं.
क्या कहना है हॉस्टल संचालकों का
वहीं हॉस्टल संचालकों का कहना है कि जब रूम खाली होने वाला होता है उसके एक महीने पहले से ही रूम के लिए पूछताछ शुरु हो जाती है और रूम खाली करने के अगले ही दिन रूम चढ़ जाता है. भोपाल में बड़ी संख्या में बच्चे बाहर से पढ़ने या नौकरी करने आते हैं इसलिए रूम बहुत दिनों तक खाली नहीं रहता.
सबसे बड़ा सवाल अब सिर्फ परीक्षा पर नहीं बल्कि सिस्टम की विश्वसनीयता पर खड़ा हो गया है. तीन साल में दो बार नीट पेपर लीक के आरोप सामने आए. ऐसे में छात्रों और अभिभावकों का भरोसा एनटीए पर लगातार कमजोर होता जा रहा है. छात्र पूछ रहे हैं अगर सुरक्षा एजेंसियां और परीक्षा सिस्टम पेपर नहीं बचा पा रहे तो उसकी कीमत हर बार छात्र और उनके परिवार क्यों चुकाए? डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले इन लाखों छात्रों ने सालों तक मेहनत की पर अब उनकी सबसे बड़ी लड़ाई किताबों से नहीं, सिस्टम से है. पेपर लीक करने वाले शायद कभी सामने भी ना आएं लेकिन उसकी सजा हर बार वही छात्र भुगत रहे हैं जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर निकले थे.
रिपोर्टर: रवीश पाल सिंह
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