Shekhupur Assembly Seat: शेखूपुर विधानसभा! इस सीट से जिस दल के विधायक जीते, प्रदेश की सत्ता भी उसी पार्टी के हाथ में गई... लेकिन विधानसभा चुनाव 2022 में टूट गया यह ट्रेंड

Shekhupur Assembly Election 2027: शेखूपुर विधानसभा सीट यूपी के बदायूं जिले की छह विधानसभा सीटों में से एक है. शेखूपुर विधानसभा सीट से जिस दल के विधायक जीते, प्रदेश की सत्ता भी उसी पार्टी के हाथ में गई. हालांकि विधानसभा चुनाव 2022 में यह ट्रेंड टूट गया. आइए 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस सीट के बारे में जानते हैं.  

Shekhupur
अंकुर चतुर्वेदी
  • बदायूं,
  • 27 जून 2026,
  • अपडेटेड 1:17 PM IST

यहां की जनता विधायक नहीं, सरकार चुनती है... शेखूपुर विधानसभा को लेकर बदायूं की सियासत में यह बात लंबे समय से कही जाती रही है. इसकी वजह भी रही. दशकों तक यहां जिस दल के विधायक जीते, प्रदेश की सत्ता भी अक्सर उसी पार्टी के हाथ में गई. हालांकि 2022 के चुनाव में यह मिथक टूट गया, जब शेखूपुर से समाजवादी पार्टी के हिमांशु यादव चुनाव जीत गए लेकिन प्रदेश में सरकार बीजेपी की बनी.

शेखूपुर विधानसभा: नई सीट, पुरानी सियासत
शेखूपुर विधानसभा बदायूं जिले की 6 विधानसभा सीटों में से एक है. यह सीट 2012 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई. उसहैत और विनावर विधानसभा क्षेत्रों को खत्म कर उनके कुछ हिस्सों को मिलाकर नई शेखूपुर विधानसभा बनाई गई. जिला मुख्यालय बदायूं शहर से सटी यह सीट राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मानी जाती है. राजधानी लखनऊ से करीब 238 किलोमीटर और दिल्ली से लगभग 248 किलोमीटर दूर स्थित शेखूपुर कस्बा सोत नदी के किनारे बसा है. बदायूं शहर से सटे इस इलाके की पहचान मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र के रूप में भी रही है.

इतिहास: सौतबाद से शेखूपुर तक
प्राचीन समय में शेखूपुर को सौतबाद के नाम से जाना जाता था. माना जाता है कि मुगल काल में फारूकी वंश के शेख इब्राहिम अली फारूकी उर्फ नवाब मोहताशिम खान ने इस बस्ती की नींव रखी थी. कहा जाता है कि मुगल सम्राट जहांगीर ने उन्हें बदायूं में जागीर दी थी, जिसके बाद यहां एक किले और बसावट का विकास हुआ. शेखूपुर किला आज भी इस इलाके के ऐतिहासिक वैभव की कहानी कहता है. स्थानीय इतिहास में यह भी माना जाता है कि नवाब मोहताशिम खान का संबंध मुगल शाही परिवार से था. उनकी पत्नी की याद में एक मकबरा बनवाया गया, जिसे स्थानीय लोग काला ताजमहल के नाम से जानते हैं. हालांकि इतिहासकारों के बीच इस दावे को लेकर अलग-अलग मत भी मिलते हैं.

राजनीतिक पृष्ठभूमि: उसहैत से शेखूपुर तक
- 2012
में शेखूपुर विधानसभा बनने से पहले इस क्षेत्र की राजनीति मुख्य रूप से उसहैत विधानसभा के इर्द-गिर्द घूमती थी. 1951 के पहले विधानसभा चुनाव में यहां के मतदाताओं ने दातागंज नॉर्थ सीट के लिए मतदान किया, जहां भारतीय जनसंघ के ओमकार सिंह विजयी रहे.

- 1957 में उसहैत विधानसभा अस्तित्व में आई और निर्दलीय प्रत्याशी मुबारक अली खान चुनाव जीतने में सफल रहे. जनसंघ के निरोत्तम सिंह दूसरे स्थान पर रहे. 1962 में जनसंघ ने ब्रजपाल सिंह पर भरोसा जताया, जबकि निरोत्तम सिंह निर्दलीय मैदान में उतरे और दूसरी बार विधायक बने.

- 1967 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया ने निरोत्तम सिंह को उम्मीदवार बनाया, लेकिन इस बार जनसंघ के ब्रजपाल सिंह चुनाव जीतने में सफल रहे. 1969 में निरोत्तम सिंह कांग्रेस के टिकट पर मैदान में आए और पहली बार कांग्रेस ने उसहैत सीट पर जीत दर्ज की. 1974 में जनसंघ के ब्रजपाल सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी फखरे आलम को हराकर दूसरी बार जीत दर्ज की.

- 1977 में जनता पार्टी की लहर में भगवान सिंह शाक्य ने कांग्रेस के फखरे आलम को 915 वोटों से हराकर पहली बार विधायक बनने का गौरव हासिल किया. 1980 में कांग्रेस (यू) और कांग्रेस (आई) के बीच मुकाबला हुआ, जिसमें कांग्रेस (यू) के फखरे आलम विजयी रहे. 1985 में कांग्रेस के निरोत्तम सिंह ने लोकदल के ब्रजपाल सिंह को हराकर सीट पर कांग्रेस की वापसी कराई.

-1989 में भगवान सिंह शाक्य ने जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए दूसरी बार जीत दर्ज की. 1991 में उसहैत विधानसभा में बनवारी सिंह यादव ने जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और बीजेपी के ब्रजपाल सिंह शाक्य को बेहद करीबी मुकाबले में लगभग 50 वोटों से हराकर पहली बार विधायक बने.

- 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन के बाद बनवारी सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के साथ चले गए. 1993 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और बीजेपी के ब्रजपाल सिंह शाक्य को हराकर दूसरी बार विधायक बने.

- 1996 में भगवान सिंह शाक्य ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए समाजवादी पार्टी के बनवारी सिंह यादव को हराया और तीसरी बार विधायक बने. 2002 में बनवारी सिंह यादव ने अपने बेटे आशीष यादव को राजनीति में उतारा. समाजवादी पार्टी से चुनाव लड़ रहे आशीष यादव ने बसपा के मुस्लिम खान को हराकर पहली बार विधानसभा पहुंचने में सफलता हासिल की.

- 2007 में बसपा ने एक बार फिर मुस्लिम खान पर भरोसा जताया. समाजवादी पार्टी से आशीष यादव मैदान में थे, जबकि भगवान सिंह शाक्य जनता दल (यू) के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे. मुस्लिम खान ने चुनाव जीतकर बसपा को उसहैत क्षेत्र में दूसरी बड़ी जीत दिलाई.

परिसीमन के बाद बदली सियासत
- 2012 में परिसीमन के बाद नई शेखूपुर विधानसभा अस्तित्व में आई. विधानसभा का नाम भले बदल गया, लेकिन राजनीति का केंद्र वही रहा. उसहैत विधानसभा में प्रभाव रखने वाले लगभग सभी बड़े नेता शेखूपुर सीट पर आ गए. एक तरफ समाजवादी राजनीति के मजबूत चेहरे बनवारी सिंह यादव का परिवार था, तो दूसरी तरफ भगवान सिंह शाक्य का राजनीतिक प्रभाव कायम रहा. 2012 में समाजवादी पार्टी से आशीष यादव और कांग्रेस से भगवान सिंह शाक्य आमने-सामने थे. आशीष यादव ने चुनाव जीतकर दूसरी बार विधानसभा का रास्ता तय किया.

- 2017 में भगवान सिंह शाक्य की जगह उनके बेटे धर्मेंद्र शाक्य मैदान में उतरे. पार्टी भी बदल चुकी थी. धर्मेंद्र शाक्य बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े, जबकि आशीष यादव समाजवादी पार्टी से मैदान में थे. धर्मेंद्र शाक्य ने 23,386 वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर पहली बार शेखूपुर सीट बीजेपी की झोली में डाली.

- 2022 में मुकाबला फिर दिलचस्प हो गया. समाजवादी पार्टी ने आशीष यादव के बेटे हिमांशु यादव को मैदान में उतारा, जबकि बीजेपी ने मौजूदा विधायक धर्मेंद्र शाक्य पर भरोसा जताया. कड़े मुकाबले में हिमांशु यादव ने करीब 6,100 वोटों से जीत दर्ज की और पहली बार विधायक बने.

दो परिवारों का दबदबा
पुरानी उसहैत और वर्तमान शेखूपुर विधानसभा की राजनीति लंबे समय तक दो बड़े राजनीतिक परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. भगवान सिंह शाक्य का परिवार अलग-अलग दलों के साथ अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखता रहा, जबकि बनवारी सिंह यादव समाजवादी राजनीति के मजबूत स्तंभ माने गए. समाजवादी पार्टी की स्थापना से लेकर 2017 में निधन तक बनवारी सिंह यादव सपा के जिला अध्यक्ष रहे. उनके निधन के बाद भी उनकी राजनीतिक विरासत खत्म नहीं हुई. बेटे आशीष यादव और नाती हिमांशु यादव उसी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.

जिसे जिताया, उसकी सरकार वाला रिकॉर्ड
शेखूपुर और पुरानी उसहैत विधानसभा को लेकर एक दिलचस्प राजनीतिक धारणा रही है कि यहां के मतदाता जिस पार्टी के विधायक को चुनते हैं, उत्तर प्रदेश में सत्ता भी अक्सर उसी दल की बनती है. 1977 में जनता पार्टी के भगवान सिंह शाक्य जीते और प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी. 1980 में कांग्रेस (यू) जीती और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही. 1985 में कांग्रेस उम्मीदवार जीते और सत्ता भी कांग्रेस के पास रही. 1989 में जनता दल के भगवान सिंह शाक्य विधायक बने और प्रदेश में जनता दल की सरकार बनी. हालांकि 1991 में यह क्रम पहली बार टूटा, जब बनवारी सिंह यादव चुनाव जीत गए लेकिन प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी. 1993, 1996, 2007, 2012 और 2017 में फिर सीट और सरकार का समीकरण काफी हद तक मेल खाता रहा. 2022 में एक बार फिर यह राजनीतिक मिथक टूट गया, जब शेखूपुर से समाजवादी पार्टी जीती लेकिन प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी.

सामाजिक ताना-बाना: किसके वोट से बनती है लड़ाई?
शेखूपुर विधानसभा का चुनावी गणित जातीय और सामाजिक समीकरणों पर काफी हद तक निर्भर करता है. यहां मुस्लिम, यादव और शाक्य/मौर्य वोटर निर्णायक भूमिका में माने जाते हैं. इसके अलावा अनुसूचित जाति, लोधी, कश्यप, पाली, ब्राह्मण, ठाकुर और वैश्य समुदाय का वोट भी जीत-हार तय करने में अहम माना जाता है.

विधानसभा क्षेत्र में कुल 3 लाख 87 हजार वोटर हैं. इसमें लगभग 55 हजार मौर्य/शाक्य/कुशवाह/सैनी, 95000 मुसलमान, 60000 यादव, 25000-25000 लोधी-कश्यप-पाली, 5000 वैश्य, 5000 ब्राह्मण, 8000 ठाकुर, SC (जाटव,धोबी कोरी,बाल्मीकि) 48000, 10 हजार कश्यप, बढ़ई 7 हजार और पाली 5 हजार व अन्य जातियों के भी मतदाता हैं. मुस्लिम और SC वोटों का गठजोड़ बसपा को पहले भी फायदा दे चुका है और यादव-मुस्लिम वोटों पर सपा की पकड़ 2012 में सपा को जीत दिला चुकी है. धर्मेंद्र शाक्य मौर्य/शाक्य वोटों के साथ सभी अन्य जातियों के सहयोग से 93702 मत पाकर विजयी हुए थे. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर मुस्लिम-यादव वोट एकजुट होते हैं तो समाजवादी पार्टी मजबूत स्थिति में रहती है, जबकि शाक्य/मौर्य और गैर-यादव ओबीसी के साथ हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बीजेपी को बढ़त दिलाता है. बसपा का प्रदर्शन अक्सर मुस्लिम और दलित वोटों की एकजुटता पर निर्भर रहा है.

2022 का जनादेश
1. प्रत्याशी हिमांशु यादव,  पार्टी SP, वोट 1,05,531
2. प्रत्याशी धर्मेंद्र कुमार शाक्य, पार्टी BJP, वोट 99,431
3. उम्मीदवार मुस्लिम खान, पार्टी BSP, वोट करीब 38 हजार+
4. जीत का अंतर: 6,100 वोट
5. कुल मतदान: लगभग 2.57 लाख वैध वोट पड़े

क्या कहती है शेखूपुर की राजनीति?
शेखूपुर ऐसी सीट है जहां सिर्फ पार्टी नहीं, उम्मीदवार का सामाजिक प्रभाव भी चुनाव तय करता है. यहां मुकाबला अक्सर संगठन, जातीय समीकरण और परिवारों की राजनीतिक पकड़ के बीच होता है. विधानसभा चुनाव 2022 ने यह जरूर दिखा दिया कि यहां के मतदाता पुराने ट्रेंड तोड़ने से भी पीछे नहीं हटते.

 

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