पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 (West Bengal Assembly Election 2026) की घोषणा के साथ ही इस राज्य में सियासी पारा चरम पर है. 294 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव दो चरणों में 23 और 29 अप्रैल 2026 को होंगे, जबकि 4 मई को वोटों की गिनती होगी और नतीजे भी उसी दिन घोषित किए जाएंगे.
वैसे तो इस विधानसभा चुनाव में कई पार्टियां अपनी किस्मत आजमा रही हैं लेकिन मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जानता पार्टी(BJP) के बीच है. ममता बनर्जी ( Mamata Banerjee) जहां चौथी बार लगातार मुख्यमंत्री बनना चाह रही हैं, तो वहीं बीजेपी हर हाल में बंगाल की सत्ता पर काबिज होना चाह रही है. ममता बनर्जी के सामने इस चुनाव में कई चुनौतियां हैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि वह आखिर कैसे बीजेपी को सत्ता में आने से रोकेंगी?
बीजेपी ने इतनी सीटों पर जीत का रखा है लक्ष्य
पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 148 सीटों का बहुमत हासिल करना होगा. इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 160 सीटों पर विजय पाने का लक्ष्य रखा है. विधानसभा चुनाव 2021 में बीजेपी को जहां 77 सीटों पर जीत मिली थी तो वहीं ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को 215 सीटों पर जीत मिली थी. एक सीट पर निर्दलीय और एक सीट पर अन्य को जीत मिली थी. आपको मालूम हो कि विधानसभा चुनाव 2016 में बीजेपी को सिर्फ 3 सीटों पर जीत मिली थी.
इस बार बीजेपी सिर्फ बहुमत का आंकड़ा को पार नहीं करना चाह रही है बल्कि वह प्रचंड बहुमत में सरकार बनाना चाह रही है. इसी चलते बीजेपी जोर-शोर से चुनावी मैदान में उतरी है. भारतीय जनता पार्टी टीएमसी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभावशाली नेतृत्व से आस लगाए हुए है. बीजेपी ने हिंदुत्व आधारित वैचारिक ध्रुवीकरण के माध्यम से देश में ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल में भी अपनी मजबूत पकड़ बनाई है. भाजपा ने बंगाल में भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित किया है. भाजपा इस बार आम लोगों की समस्याओं को लेकर चुनावी मैदान में उतरी है. ऐसे में इस बार टीमसी को बीजेपी से कड़ी टक्कर मिलने वाली है.
ममता बनर्जी के आगे कई चुनौतियां
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में प्रचंड जीत दर्ज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के आगे विधानसभा चुनाव 2026 में कई चुनौतियां हैं. ममता बनर्जी ने 2011 का विधानसभा चुनाव जहां वामपंथी शासन को हटाने के लड़ा था, वहीं विधानसभा चुनाव 2026 बंगाल को बीजेपी से बचाने की लड़ाई है. ममता बनर्जी के आगे इस विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी लहर की चुनौती, वोटरों के नाम कटने का असर, तृणमूल कांग्रेस पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से पार पाने की बड़ी चुनौती है. इसके अलावा ममता बनर्जी को पार्टी के अंदर आंतरिक कलह, पश्चिम बंगाल में बदहाल कानून व्यवस्था, बेरोजगारी और विकास से जुड़े सवालों का जवाब भी इस चुनाव में देना होगा.
ममता बनर्जी को करीब डेढ़ दशक से सत्ता में रहने के कारण इस बार चुनाव में सत्ता विरोधी माहौल का सामना करना पड़ सकता है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में सांप्रदायिक मुद्दों पर वोटिंग बढ़ेगी, जिसका नुकसान ममता बनर्जी को उठाना पड़ सकता है. बीजेपी ने हिंदुत्व आधारित वैचारिक ध्रुवीकरण के माध्यम से देश में ही नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल में भी अपनी मजबूत पकड़ बनाई है.
वोटरों के नाम कटने का असर
इस चुनाव में ममता बनर्जी के लिए एक बड़ी चुनौती एसआईआर (SIR) यानी Special Intensive Revision है. मतदाता सूची से वोटरों के नाम कटने का सबसे अधिक असर ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी पर पड़ेगा. शहरी इलाको में जैसे कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों में नाम कटने से नाराजगी बढ़ी है, तो उसे नियंत्रित करने की चुनौती टीमसी को होगी. आपको मालूम हो कि ममता बनर्जी ने कहा था कि वह एसआईआर के कारण वोटर लिस्ट से किसी का नाम नहीं कटने देंगी, लेकिन वह अपना वादा पूरा नहीं कर पाईं. देश की आजादी के बाद यह पहला मौका है जब पश्चिम बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या पिछले चुनावों के अपेक्षा कम हुई है. पश्चिम बंगाल में SIR के बाद अंतिम मतदाता सूची से करीब 63 लाख 66 हजार मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं. करीब 60.6 लाख मतदाताओं के नाम अभी भी जांच के दायरे में हैं.
भ्रष्टाचार के आरोप
पिछले कुछ वर्षों में तृणमूल कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे हैं. चुनाव प्रचार में बीजेपी इसे जोर-शोर से उठा रही है. टीएमसी को शिक्षक भर्ती, पीडीएस स्कैम, कैटल स्मगलिंग स्कैम और अन्य घोटालों को लेकर आलोचना झेलनी पड़ी है. इससे मतदाताओं में टीएमसी के प्रति नाराजगी बढ़ी है. भ्रष्टाचार के आरोपों से पार पाना ममता बनर्जी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है.
पार्टी में आंतरिक गुटबाजी
ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के भीतर आंतरिक गुटबाजी काफी बढ़ गई है. ऊपर से इस विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने 74 विधायकों का टिकट काट दिया है. इसके साथ ही 15 विधायकों की सीट बदल दी है. इससे पार्टी में आंतरिक गुटबाजी और बढ़ेगी. टिकट कटने वाले नेता बगावत कर सकते हैं. स्थानीय स्तर पर संगठन कमजोर हो सकता है. इससे पार पाने में ममता बनर्जी को कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी. ममता बनर्जी भी इस बात को बखूबी समझ रही हैं कि उनके लिए यह विधानसभा चुनाव आसान नहीं होने वाला है. उधर, बीजेपी इसका लाभ उठाना चाहेगी.