West Bengal Election 2026: बीजेपी-टीएमसी... लेफ्ट या कांग्रेस... आखिर कौन बंगाल की सत्ता पर होगा काबिज? जानें चारों पार्टियों की ताकत और कमजोरी

West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखों के ऐलान के साथ इस राज्य में सियासी पारा चढ़ा हुआ है. इस बार बीजेपी और टीएमसी में मुख्य मुकाबला माना जा रहा है लेकिन लेफ्ट और कांग्रेस भी जीत के लिए हर तिकड़म अपना रही है. कौन बंगाल की सत्ता पर काबिज होगा यह तो 4 मई को चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद पता चल जाएगा. उससे पहले आइए चारों पार्टियों की ताकत और कमजोरियों के बारे में जानते हैं. 

West Bengal Election 2026
मिथिलेश कुमार सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 19 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 4:48 PM IST

पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों के लिए चुनाव 23 और 29 अप्रैल 2026 को होना है. 4 मई को मतगणना के बाद उसी दिन नतीजे घोषित किए जाएंगे. इस बार ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC),भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच दिलचस्प मुकाबले के आसार हैं. उधर, पश्चिम बंगाल में लगातार 34 साल तक राज करने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) भी इस बार पूरी ताकत के साथ चुनावी मैदान में है. कांग्रेस ने इस बार वाम दलों से गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का साहसी फैसला किया है. कौन बंगाल की सत्ता पर काबिज होगा यह तो 4 मई को चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद पता चल जाएगा. उससे पहले आइए चारों पार्टियों की ताकत और कमजोरियों के बारे में जानते हैं. आपको मालूम हो कि किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए 148 सीटों का बहुमत हासिल करना होगा.

भाजपा और टीएमसी का इस बार क्या है नारा?
ममता बनर्जी ने पिछली बार खेला होबे का नारा दिया था. यह नारा काफी लोकप्रिय रहा था. इस बार भाजपा ने परिवर्तन चाई, बीजेपी ताई यानी बदलाव चाहिए, इसलिए इस बार भाजपा का नारा दिया है. उधर, बीजेपी के इस नारा के जवाब में टीएमसी ने बाचते चाई, बीजेपी बाई यानी जीवित रहना चाहते हैं, इसलिए बीजेपी को विदाई का नया नारा दिया है.

1. टीएमसी की ताकत और कमजोरी 
पश्चिम बंगाल में अभी ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की सरकार है. साल 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने के बाद से टीएमसी बंगाल की सत्ता पर काबिज है. ममता बनर्जी की बंगाल में प्रभावशाली छवि और कल्याणकारी योजनाएं टीएमसी की ताकत हैं. ममता की छवि बंगाल के ग्रामीण इलाकों में काफी गहरी है. 

विपक्षी पार्टियों के पास इसका तोड़ नहीं है. टीएमसी का मजबूत बूथ स्तरीय संगठन और लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री और स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं ने महिलाओं और गरीबों के बीच एक मजबूत वोट बैंक तैयार किया है. टीएमसी की कमजोरी की बात करें तो इसकी सबसे बड़ी कमजोरी सत्ता विरोधी लहर है. इसके अलावा भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं. जिला स्तर पर गुटबाजी और स्थानीय नेताओं के प्रति जनता का आक्रोश ममता बनर्जी की फिर सत्ता पर काबिज होने की राह में बाधा डाल सकते हैं. 

2. बीजेपी की ताकत और कमजोरी
भारतीय जनता पार्टी इस बार जोर-शोर से चुनावी मैदान में उतरी है. इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 160 सीटों पर विजय पाने का लक्ष्य रखा है. विधानसभा चुनाव 2021 में बीजेपी को जहां 77 सीटों पर जीत मिली थी, वहीं विधानसभा चुनाव 2016 में  बीजेपी को सिर्फ 3 सीटों पर जीत मिली थी. इस बार विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रामक रुख बीजेपी की ताकत है. भारतीय जनता पार्टी ने हिंदुत्व आधारित वैचारिक ध्रुवीकरण के माध्यम से भी अपनी पकड़ बनाई है. 

इसके साथ ही कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर भी ध्यान केंद्रित किया है. बीजेपी की कमजोरी की बात करें तो इस पार्टी के पास स्थानीय स्तर पर कद्दावर बंगाली चेहरे की कमी और टीएमसी द्वारा थोपा गया ‘बाहरी’का टैग है. भाजपा की प्रदेश इकाई में जारी आंतरिक कलह भी बड़ी परेशानी है. उत्तर भारतीय मॉडल पर अत्यधिक निर्भरता बंगाल में बीजेपी की जीत की संभावनाओं को सीमित कर सकती है. कुछ राजनीति के जानकारों का कहना है कि एसआईआर पर भाजपा के अत्यधिक जोर देने से मतुआ समुदाय जैसे विभिन्न समूह इस चुनाव में बीजेपी से दूरी बना सकते हैं. आपको मालूम हो कि राष्ट्रीय स्तर पर कई करिश्माई नेताओं के बावजूद बीजेपी को बंगाल में टीएमसी से हार का सामना करना पड़ता है. विश्लेषकों के मुताबिक टीएमसी की भाजपा को बाहरी बताने की मुहिम कारगर रही है. 

3.  माकपा की ताकत और कमजोरी
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी माकपा कभी पश्चिम बंगाल में लगातार 34 सालों तक सत्ता पर काबिज रही थी. 1977 से 2011 तक वाम मोर्चे ने राज्य पर शासन किया था. आज यह पार्टी हाशिये पर है. यह पार्टी इस विधानसभा चुनाव में अपनी खोई जमीन वापस पाने में जुटी हुई है. इस पार्टी को अपने स्वच्छ छवि वाले नेताओं और शिक्षक भर्ती घोटाला और आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े मुद्दों पर किए गए आंदोलनों से उम्मीद है. हालांकि यह देखना होगा कि यह आक्रोश वोटों में तब्दील हो पाता है या नहीं. माकपा की कमजोरी यह है कि आंदोलनों और प्रदर्शनों के बावजूद इस पार्टी को 2021 के विधानसभा चुनावों और 2019 एवं 2024 के लोकसभा चुनावों में कोई खास लाभ नहीं हुआ. पिछले चुनावों में पार्टी का वोट प्रतिशत काफी कम हो गया है. घटता जनाधार और नेताओं का उम्रदराज होना वाम मोर्चा के लिए बड़ी बाधाएं हैं. संगठनात्मक ढांचा भी पहले जितना मजबूत नहीं रहा.

4. कांग्रेस की ताकत और कमजोरी 
कांग्रेस ने इस बार विधानसभा चुनाव में वाम दलों से गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इस पार्टी ने पश्चिम बंगाल में अपनी प्रासंगिकता एक बार फिर बहाल करने के लिए यह निर्णय लिया है. कांग्रेस मालदा मुर्शिदाबाद और नदिया जैसे अपने पारंपरिक गढ़ों से काफी उम्मीद है. इन क्षेत्रों में कांग्रेस को उम्मीद है कि वह अपने पुराने वोट बैंक को फिर से सक्रिय कर सकती है. इस बार चुनाव में कांग्रेस पार्टी के टिकट के लिए बड़ी संख्या में आवेदन आए हैं, जो इस पार्टी के लिए एक ताकत हो सकती है. कांग्रेस की कमजोरी यह है कि इस पार्टी के पास संसाधनों की कमी है. बंगाल के कई जिलों में कमजोर नेटवर्क कांग्रेस के सामने बड़ी कमजोरी है. 


 

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