Success Story: परिवार को सपोर्ट करने के लिए, दीवारों पर करता था पुताई... अब मजदूर मां का बेटा हाथ में थामेगा स्टेथेस्कोप

घर की आर्थिक मजबूरी में परिवार का काम कर साथ दिया करते थे. लेकिन एक कोचिंग संस्थान के कार्यक्रम के तहत स्कॉलरशिप मिली. जिसके बाद शिक्षा, रहना, खानपान की सुविधा मिली. जिसके बाद उन्होंने कड़ी के मेहनत के बलबूते नीट को क्रेक कर लिया.

NEET क्रेक करने वाले सूरज सुमन
चेतन गुर्जर
  • कोटा,
  • 21 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:07 PM IST

कहते हैं कि सपने देखने का हक हर किसी को होता है, लेकिन उन्हें सच करने का साहस बहुत कम लोग जुटा पाते हैं. बूंदी जिले के कापरेन कस्बे के रहने वाले सूरज सुमन ने साबित कर दिया कि अगर हौसले बुलंद हों तो गरीबी, अभाव और मजबूरियां भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकतीं. जो हाथ कभी गांव-कस्बों में लोगों के घरों की पुताई कर परिवार का खर्च चलाने में मां का सहारा बनते थे, वही हाथ अब स्टेथेस्कोप थामकर मरीजों का इलाज करेंगे.

सूरज ने नीट-यूजी 2026 में 583 अंक हासिल कर, 99.1593559 पर्सेंटाइल पाया. जिसके बाद उनका सरकारी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश का रास्ता बन गया है. यह सफलता केवल एक परीक्षा पास करने की नहीं, बल्कि संघर्ष, मेहनत और उम्मीदों की सबसे बड़ी जीत है.

घर चलाने के लिए करते थे पुताई

सूरज का परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है. परिवार की जिम्मेदारियां कम उम्र से ही उसके कंधों पर आ गई थीं. छुट्टियों और खाली समय में वह गांव-कस्बों में पुताई का काम करता था, ताकि घर का खर्च चलाने में मां का हाथ बंटा सके.

उसकी मां घीसी बाई और छोटी बहन गरिमा खेतों में मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करती रहीं. आर्थिक तंगी इतनी ज्यादा थी कि बहन गरिमा को गांव में आगे पढ़ाई की सुविधा नहीं मिलने और पैसों की कमी के कारण आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी. वह भी मां के साथ मजदूरी करने लगी. अब सूरज ने संकल्प लिया है कि डॉक्टर बनने के साथ सबसे पहले बहन की पढ़ाई दोबारा शुरू करवाएगा.

आर्थिक तंगी के बीच मिला शिक्षा का 'संबल'

सूरज ने 10वीं में 87 प्रतिशत और 12वीं में 85 प्रतिशत अंक हासिल किए. बायोलॉजी उसका पसंदीदा विषय था और बचपन से डॉक्टर बनने का सपना देखता था. लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी का खर्च उठा सके.

इसी दौरान वह कोटा में एलन कोचिंग की जानकारी लेने पहुंचा. यहां उसे एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट और एलएन माहेश्वरी परमार्थ न्यास द्वारा संचालित 'शिक्षा संबल' कार्यक्रम के बारे में पता चला. चयन परीक्षा में सफल होने के बाद उसे नीट की निशुल्क कोचिंग के साथ पूरी तरह निशुल्क भोजन और आवास की सुविधा भी मुहैया कराई गई. यही सहयोग उसके सपनों की उड़ान का सबसे मजबूत आधार बना.

रह सकता था सपना अधूरा

सूरज कहता है कि 'शिक्षा संबल' ने उसके जीवन को वास्तविक संबल दिया. यदि यह अवसर नहीं मिलता तो शायद वह कभी इतनी अच्छी सुविधाओं के साथ कोटा आकर मेडिकल की तैयारी करने की कल्पना भी नहीं कर पाता.

उसके अनुसार यह उसके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. पूरे साल उसे पढ़ाई के साथ रहने, खाने और हर जरूरत की बेहतर सुविधाएं मिलीं, जिससे वह पूरी तरह अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर सका. अब उसका सबसे बड़ा सपना अपनी बहन की अधूरी पढ़ाई दोबारा शुरू करवाना है.

हालातों से नहीं किया कोई समझौता

सूरज की कहानी केवल पढ़ाई की नहीं, बल्कि संघर्ष से लड़ने की कहानी है. उसने गरीबी के आगे हार नहीं मानी, बल्कि हालातों का डटकर सामना किया. दिन में पढ़ाई और खाली समय में मजदूरी व पुताई कर उसने यह साबित किया कि मेहनत करने वाला इंसान किसी भी परिस्थिति को अपनी कमजोरी नहीं बनने देता.

हर प्रतिभा को मिलना चाहिए अवसर

इस उपलब्धि पर एलन के निदेशक और एलएन माहेश्वरी परमार्थ न्यास के ट्रस्टी नवीन माहेश्वरी ने कहा कि संस्थान का उद्देश्य केवल छात्रों को पढ़ाना नहीं, बल्कि प्रतिभाशाली और जरूरतमंद विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का अवसर देना है. उन्होंने बताया कि हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों के ऐसे विद्यार्थी, जो संसाधनों के अभाव में पीछे रह जाते हैं, उनके लिए तीन वर्ष पहले 'शिक्षा संबल' कार्यक्रम शुरू किया गया था. अब इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं.

संघर्ष से सफलता तक की मिसाल

सूरज सुमन की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सपनों की ऊंचाई आर्थिक हालात नहीं, बल्कि इंसान का हौसला तय करता है. जिन हाथों में कभी पुताई का ब्रश था, उन्हीं हाथों में अब स्टेथेस्कोप होगा. यह सफलता सिर्फ एक छात्र की नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अभावों के बावजूद अपने सपनों को जिंदा रखे हुए हैं.

 

Read more!

RECOMMENDED