गोरखपुर के सहजनवा थाना क्षेत्र की रहने वाली दिव्या सिंह जिनकी उम्र महज 28 वर्ष है और वह प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं. उन्होंने इतिहास रचते हुए माउंट एवरेस्ट बेस कैंप को साइकिल के साथ फतह किया है. एक तरफ जहां लोग ऊंचाइयों पर चढ़ाई के वक्त हल्के सामानों के साथ चढ़ाई करना पसंद करते है तो वहीं दिव्या ने साइकिल के साथ इस सफर को अंजाम देने को ठान लिया.
अपने यात्रा का जिक्र करते हुए दिव्या सिंह ने बताया कि बचपन में उन्हें जब भी माउंट एवरेस्ट के बारे में पढ़ा था तभी से उन्हें माउंट एवरेस्ट को अपनी आंखों से देखने की इच्छा थी. माउंट एवरेस्ट से जमीन या आसपास का क्षेत्र कैसा दिखता होगा इसको लेकर उनको काफी ललक थी. इसके तहत उन्होंने अपने सपनों का पीछा करना शुरू किया और एक माउंटेनियर और साइकिलिस्ट उमा सिंह के संपर्क में आई जिसके बाद उन्होंने अपनी ट्रेनिंग शुरू कर दिया और अपने आप को तैयार किया.
14 दिनों का सफर
उनके गुरु उमा सिंह ने बताया कि माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप पर ऐसे तो बहुत लोग पहुंच चुके हैं लेकिन अभी तक कोई ऐसी महिला नहीं है जो साइकिल के साथ इस मुकाम को हासिल किया हो. बस फिर क्या दिव्या ने उस चुनौती को गुरु मंत्र के रूप में लिया और उसको फतह करने के लिए अपने आप को तैयार करना शुरू कर दिया. दिव्या सिंह ने अपने शरीर को उस चुनौती से निपटने के लिए ढालना शुरू किया लिहाजा तमाम नेपाल के पहाड़ी इलाकों में, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान के माउंट में साइकिलिंग और चलना शुरू किया. जिसके बाद 16 मार्च को उन्होंने माउंट एवरेस्ट की बेस कैंप पर चढ़ाई शुरू कर दी और कुल 14 दिन का सफर तय करते हुए उन्होंने माउंट एवरेस्ट बेस कैंप पर भारत का तिरंगा फहराया. यह क्षण उनके लिए काफी भावनात्मक था क्योंकि उन्होंने बताया कि जैसे ही उन्होंने तिरंगा फहराया वह वहां पर एकदम फ्रीज हो गई उनके पास कहने को कुछ शब्द नहीं थे. गौरतलब है कि दिव्या ने यह कीर्तिमान रचने के बाद वापस गोरखपुर आई है.
संघर्षों से भरा था पूरा सफर
दिव्या की मानें तो इस यात्रा में बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. मौसम बहुत ही ज्यादा खराब था. हर दिन स्नोफॉल और बारिश होती रहती और कभी कभी तो पूरे दिन ये सिलसिला चलता रहता था. इसके साथ ही तेज ठंडी हवा लगातार पूरे दिन चलती थी. दिन में भी तापमान माइनस में चला जाता था. यह सफर जितना खूबसूरत था, उतना ही कठिन भी. रास्ता ऐसा था कि हर दिन आधे से ज्यादा समय साइकिल को कंधे पर उठाकर चलना पड़ा. ग्लेशियर के बीच, वातावरण में कम ऑक्सीजन, ऊंचाई, ठंड, थकान और दर्द सब एक साथ थे. हर सुबह शरीर भारी होता था, ऑक्सीजन की कमी और हृदय गति 120/मिनट होने के कारण सांस फूलने लगती थी, फिर भी हर दिन लगभग 10 से 12 घंटे साइकिलिंग करनी पड़ती थी. इन सबके बावजूद वो हार नहीं मानती थी.
परिवार का मिला समर्थन
परिवार के बारे में बताते हुए दिव्या कहती है कि उनके पिताजी किसान है और तीन बहनों में वो सबसे बड़ी है. सुरक्षा को लेकर पिताजी चिंतित रहते है लेकिन मेरे हौसलों से उनको भी हौसला मिलता है. अब आगे भी मेरी साइकिल की रफ्तार थमने वाली नहीं है और देश विदेश की ऊंची चोटियों को साइकिल के साथ फतह करने का लक्ष्य है.
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