गुजरात का 'बनास BIO-CNG' मॉडल अब देशभर में एक सफल ऊर्जा और ग्रामीण विकास प्रणाली के रूप में पहचाना जा रहा है. इसकी सफलता को देखते हुए देश के लगभग 15 राज्य इसे अपने यहां लागू करने की तैयारी में हैं. यह मॉडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'वेस्ट टू वेल्थ', आत्मनिर्भर भारत और हरित ऊर्जा के विजन को धरातल पर उतारने का मजबूत उदाहरण बन चुका है.
छह वर्षों से सफल प्रोजेक्ट
बनासकांठा में मौजूद 40 मीट्रिक टन प्रतिदिन की क्षमता वाला BIO-CNG प्लांट पिछले 6 वर्षों से लगातार सफलतापूर्वक चल रहा है. इसकी उपलब्धियों से प्रेरित होकर जिले में पांच और बड़े BIO-CNG प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं. नियोजित पांच में से दो प्लांट शुरू भी हो चुके हैं, जबकि तीसरा अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है.
राज्य सरकार की प्राथमिकता, स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण मजबूती
गुजरात सरकार ने BIO-CNG क्षेत्र को बजट में उच्च प्राथमिकता दी है. सहकारी दुग्ध संघों को नए प्लांट लगाने के लिए 60 करोड़ रुपए का विशेष प्रावधान किया गया है. इस योजना के अंतर्गत चरणबद्ध तरीके से राज्य में लगभग 10 BIO-CNG प्लांट स्थापित करने का लक्ष्य है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग मजबूत होता है.
प्रत्येक प्लांट की क्षमता और निवेश संरचना
हर प्लांट प्रतिदिन लगभग 100 मीट्रिक टन गोबर को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस करता है. लगभग 50–55 करोड़ रुपए की लागत से तैयार ये संयंत्र आधुनिक तकनीक और उच्चस्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर का उदाहरण हैं. यह मॉडल दिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास साथ-साथ चल सकते हैं.
ग्रामीणों की आय और रोजगार में बढ़ोतरी
BIO-CNG प्लांट की परिधि में 20 से 25 गांवों के पशुपालक परिवार जुड़े हैं. इन्हें गोबर के बदले 1 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से भुगतान होता है, जिससे लगभग 400-450 परिवारों को अतिरिक्त आय मिलती है. गोबर परिवहन के लिए 13 ट्रैक्टर-ट्रॉली रोजाना 4-4 मीट्रिक टन क्षमता के साथ कार्यरत हैं, जिससे स्थानीय रोजगार भी बढ़ा है.
CNG, ठोस व बहुप्रतिफल वाला आर्थिक मॉडल
यह संयंत्र प्रतिदिन करीब 1,800 किलोग्राम BIO-CNG तैयार करता है, जिसे लगभग 75 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बाजार में बेचा जाता है. इसके साथ 25 मीट्रिक टन ठोस और 75 मीट्रिक टन तरल जैविक उर्वरक का उत्पादन होता है, जिनकी कीमत लगभग 6 रुपए और 0.50 रुपए प्रति किलोग्राम है. इन सबके चलते संयंत्र को प्रतिदिन 3 लाख रुपए से अधिक का राजस्व मिलता है, जो सालाना लगभग 12 करोड़ रुपए तक पहुंचता है.
यह मॉडल हर वर्ष लगभग 6,750 टन CO2e ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की क्षमता रखता है. स्वच्छ ईंधन, जैविक उर्वरक और वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन का यह संयोजन 'ग्रीन बनासकांठा' से 'ग्रीन गुजरात' तक के लक्ष्य को वास्तविक रूप दे रहा है.
(रिपोर्ट- ब्रिजेश दोशी)
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