बिहार के जमुई जिले के एक छोटे से गांव से ऐसी कहानी सामने आई है, जिसकी हर ओर चर्चा हो रही है. खैरा प्रखंड के केंडीह गांव में महादलित समुदाय के टोला सेवक जयकांत मांझी ने अपने संघर्ष और संकल्प से पूरे समाज की सोच बदल दी है. उन्होंने सिर्फ बच्चों को स्कूल भेजने की बात नहीं की, बल्कि खुद जिम्मेदारी उठाकर शिक्षा की एक नई मिसाल कायम कर दी. आज उनके प्रयास से महादलित बस्ती के बच्चे स्कूल की ओर बढ़ रहे हैं और पढ़ाई से जुड़ रहे हैं.
ई-रिक्शा बन गया शिक्षा की नई उम्मीद
आमतौर पर शहरों में बच्चों को स्कूल बस का इंतजार करते देखा जाता है, लेकिन केंडीह गांव में हर सुबह एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है. यहां किसी निजी स्कूल की बस नहीं, बल्कि टोला सेवक जयकांत मांझी का ई-रिक्शा बच्चों को लेने पहुंचता है. उत्क्रमित मध्य विद्यालय केंडीह से टैग महादलित प्राइमरी स्कूल में कार्यरत जयकांत मांझी हर दिन करीब 80 बच्चों को घर से स्कूल और फिर स्कूल से वापस घर तक पहुंचाते हैं. वह सिर्फ बच्चों को स्कूल छोड़ने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि गांव के अलग-अलग टोले में जाकर बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित भी करते हैं. कई छोटे बच्चों को खुद तैयार करवाकर ई-रिक्शा में बैठाकर स्कूल लेकर आते हैं.
गरीबी से संघर्ष ने दी समाज बदलने की प्रेरणा
जयकांत मांझी बताते हैं कि उनका बचपन संघर्षों से भरा रहा. परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं था. कई बार किताब-कॉपी खरीदना भी मुश्किल हो जाता था. कभी ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करनी पड़ी तो कभी दिहाड़ी करके अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला.
हालात ऐसे भी आए जब पढ़ाई छोड़ने का मन हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. यही संघर्ष आगे चलकर उनके लिए प्रेरणा बना. जयकांत कहते हैं कि अगर उन्हें समय पर सहारा नहीं मिला होता, तो शायद वह भी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते. इसी सोच ने उन्हें गांव के बच्चों के लिए कुछ करने की ताकत दी.
बाइक से शुरू हुई कोशिश, फिर खरीदा ई-रिक्शा
शुरुआत में जयकांत अपनी बाइक से बच्चों को स्कूल पहुंचाने की कोशिश करते थे, लेकिन एक बार में दो-तीन बच्चों से ज्यादा को ले जाना संभव नहीं था. कई बच्चे छूट जाते थे. इसके बाद उन्होंने अपनी मेहनत और बचत के पैसों से ई-रिक्शा खरीदा. आज यही ई-रिक्शा महादलित बच्चों की शिक्षा का सबसे बड़ा सहारा बन चुका है. तेज धूप, बारिश या कड़ाके की ठंड, हर मौसम में जयकांत का यह सफर बिना रुके जारी रहता है.
विद्यालय प्रधान का कहना
जयकांत मांझी की इस पहल का असर अब पूरे इलाके में साफ नजर आने लगा है. पहले जो बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, वे अब नियमित रूप से पढ़ाई के लिए पहुंच रहे हैं. महादलित समाज के करीब सौ बच्चे शिक्षा से जुड़ चुके हैं. विद्यालय प्रधान शिवेंदु कुमार का कहना है कि सिर्फ सरकारी योजनाओं से बदलाव संभव नहीं होता, कुछ लोग अपने प्रयासों से समाज के लिए मिसाल बनते हैं. वहीं प्रधानाध्यापक अमरजीत कुमार सिंह ने जयकांत को मेहनती और प्रतिभाशाली व्यक्ति बताते हुए उनकी सराहना की.
टोला सेवक जयकांत मांझी का शिक्षा के प्रति समर्पण और महादलित बच्चों को पढ़ाई से जोड़ने की मुहिम निश्चित रूप से प्रेरणादायक है. अब सवाल यह है कि समाज में बदलाव ला रहे इस शख्स के संघर्ष और संकल्प को सरकार कब पहचान देगी और उनके प्रयासों को किस तरह सम्मान मिलेगा.
(रिपोर्ट- राकेश कुमार सिंह)
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