पैंक्रियाटिक कैंसर के खिलाफ लड़ाई में मिली बड़ी सफलता, नई दवा Daraxonrasib से मरीजों की जिंदगी दोगुनी लंबी हो सकती है

भारत में पिछले महीने कुछ प्रकार के फेफड़ों के कैंसर के इलाज के लिए 7 मिनट में दी जाने वाली इंजेक्शन थेरेपी लॉन्च की गई थी. अब अग्नाशय (पैंक्रियाटिक) कैंसर के इलाज में एक नई उम्मीद सामने आई है.

pancreatic cancer patients
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 02 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:36 AM IST

दुनियाभर में कैंसर के इलाज को लेकर लगातार नए शोध हो रहे हैं. अब वैज्ञानिकों ने पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में एक बड़ी सफलता हासिल की है. नई दवा Daraxonrasib ने क्लिनिकल ट्रायल में ऐसे नतीजे दिए हैं, जिन्हें गेम चेंजर माना जा रहा है.

अमेरिका में किए गए एक बड़े अध्ययन के मुताबिक, इस दवा को लेने वाले मरीजों की औसत जीवित रहने की अवधि लगभग दोगुनी हो गई. यही वजह है कि कैंसर विशेषज्ञ इसे पैंक्रियाटिक कैंसर के इलाज में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बता रहे हैं.

क्या होता है पैंक्रियाटिक कैंसर?
पैंक्रियास यानी अग्नाशय शरीर का वह अंग है जो भोजन पचाने वाले एंजाइम और ब्लड शुगर कंट्रोल करने वाले हार्मोन बनाता है. जब इस अंग की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं, तब पैंक्रियाटिक कैंसर विकसित होता है. इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते. ज्यादातर मामलों में कैंसर तब पता चलता है, जब यह शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल चुका होता है.

पैंक्रियाटिक कैंसर के लक्षण
इसके प्रमुख लक्षणों में पेट दर्द, भूख कम लगना, तेजी से वजन घटना, पीलिया, गहरे रंग का पेशाब, लगातार थकान और डायबिटीज की समस्या का बढ़ना शामिल है.

500 मरीजों पर हुआ अध्ययन
Daraxonrasib पर किए गए अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल New England Journal of Medicine में प्रकाशित हुए हैं. यह रिसर्च बोस्टन स्थित Dana-Farber Cancer Institute के नेतृत्व में की गई और इसे अमेरिका की कैंसर विशेषज्ञ संस्था ASCO की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किया गया. अध्ययन में करीब 500 ऐसे मरीज शामिल थे, जिनका पैंक्रियाटिक कैंसर शरीर में फैल चुका था.

रिसर्च में पाया गया कि Daraxonrasib लेने वाले मरीज औसतन 13.2 महीने तक जीवित रहे, जबकि पारंपरिक कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों की औसत जीवित रहने की अवधि 6.6 से 6.7 महीने रही.

कैसे काम करती है यह दवा?
पैंक्रियाटिक कैंसर के 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में KRAS नामक एक बदला हुआ प्रोटीन ट्यूमर की वृद्धि के लिए जिम्मेदार होता है. Daraxonrasib इसी KRAS प्रोटीन को निशाना बनाती है और उसकी गतिविधि को रोकती है. इससे कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने और फैलने के संकेत मिलना बंद हो जाते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि यह दवा कैंसर को पूरी तरह खत्म नहीं करती, लेकिन बीमारी की रफ्तार को काफी हद तक धीमा कर देती है. कई मरीजों में ट्यूमर का आकार घटा और दर्द में भी कमी दर्ज की गई.

हजारों मरीजों के लिए नई उम्मीद
अमेरिका में हर साल हजारों नए पैंक्रियाटिक कैंसर के मामले सामने आते हैं. भारत में भी यह बीमारी तेजी से चिंता का विषय बन रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि Daraxonrasib भविष्य में इस कैंसर के इलाज का तरीका बदल सकती है. फिलहाल दवा को पूरी मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) इसकी समीक्षा प्रक्रिया को तेज कर रहा है. कुछ योग्य मरीजों को विशेष कार्यक्रम के तहत यह दवा उपलब्ध कराई जा रही है.

 

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