गर्भावस्था के दौरान बच्चे की सेहत जांचना हमेशा से एक चुनौती रहा है. अभी तक कई गंभीर जेनेटिक बीमारियों का पता लगाने के लिए इनवेसिव टेस्ट जैसे एम्नियोसेंटेसिस या CVS (कोरियोनिक विलस सैंपलिंग) किए जाते हैं, जिनमें कुछ जोखिम भी होता है. लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ब्लड टेस्ट विकसित किया है जो मां के खून से ही हजारों जेनेटिक बीमारियों का पता लगा सकता है.
क्या है नया नॉन-इनवेसिव फीटल सीक्वेंसिंग टेस्ट?
इस नई तकनीक को नॉन-इनवेसिव फीटल सीक्वेंसिंग (NIFS) कहा जा रहा है. इसमें गर्भवती महिला के ब्लड में मौजूद बच्चे के डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़ों का विश्लेषण किया जाता है. यही डीएनए भ्रूण की जेनेटिक जानकारी देता है. यह तकनीक इतनी एडवांस है कि यह लगभग पूरे जेनेटिक कोड की जांच कर सकती है.
कैसे काम करता है यह टेस्ट?
गर्भावस्था के दौरान बच्चे का कुछ डीएनए मां के खून में मिल जाता है. इस ब्लड सैंपल को लेकर हाई-लेवल डीएनए सीक्वेंसिंग की जाती है. इसके बाद एडवांस कंप्यूटर एल्गोरिद्म की मदद से लगभग 23,000 जीन का विश्लेषण किया जाता है और यह पता लगाया जाता है कि कोई जेनेटिक खराबी मौजूद है या नहीं.
कितना सटीक है यह नया तरीका?
शोधकर्ताओं ने इस टेस्ट को 565 गर्भवती महिलाओं पर परीक्षण किया. औसतन यह टेस्ट गर्भावस्था के 17वें हफ्ते में किया गया. नतीजों में पाया गया कि यह टेस्ट 95% से 99% तक उन जेनेटिक बदलावों को पकड़ने में सफल रहा, जिन्हें पारंपरिक इनवेसिव टेस्ट भी पहचानते हैं. इसके अलावा 97% से ज्यादा क्लिनिकली महत्वपूर्ण मामलों को भी यह टेस्ट सही तरीके से पकड़ पाया.
किन बीमारियों का पता लगाया जा सकता है?
सिस्टिक फाइब्रोसिस
नूनन सिंड्रोम
चार्ज सिंड्रोम
स्टिकलर सिंड्रोम
अकॉन्ड्रोप्लासिया (बौनापन से जुड़ी बीमारी)
और कई अन्य दुर्लभ जेनेटिक डिसऑर्डर
मौजूदा टेस्ट से कितना अलग है यह तरीका?
अभी तक डाउन सिंड्रोम जैसी कुछ चुनिंदा स्थितियों के लिए ही नॉन-इनवेसिव ब्लड टेस्ट उपलब्ध थे. लेकिन बाकी बीमारियों के लिए एम्नियोसेंटेसिस या CVS जैसी प्रक्रियाएं करनी पड़ती हैं. इन प्रक्रियाओं में सुई के जरिए गर्भ से सैंपल लिया जाता है, जिससे लगभग 1 में से 200 मामलों में गर्भपात का जोखिम भी रहता है. नई तकनीक इस जोखिम को खत्म कर सकती है क्योंकि इसमें सिर्फ ब्लड सैंपल की जरूरत होती है.
डॉक्टर और वैज्ञानिक क्या कह रहे हैं?
यह तकनीक प्रेग्नेंसी के दौरान एक फ्रंटलाइन टेस्ट बन सकती है, खासकर तब जब अल्ट्रासाउंड में कोई समस्या दिखाई दे.
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