कोमा में 2 साल, 4 करोड़ का इलाज... बूढ़े माता-पिता ने घर बेचकर बचा रहे बेटे की जिंदगी

आनंद के परिवार पर वित्तीय दबाव बहुत बड़ा है. अब तक उनके मेडिकल बिल्स 4 करोड़ रुपए पार कर चुके हैं. परिवार ने अपना जमीन और सारी बचत बेच दी है. इसी बीच, मुंबई में उनके घर को बीएमसी ने ध्वस्त कर दिया.

Anand Dixit
gnttv.com
  • मुंबई ,
  • 18 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:38 PM IST

भारत में कोमा से जूझ रहे कई मरीज हैं. लेकिन हाल ही में ये मेडिकल कंडीशन तब सुर्खियों में आई, जब अदालत ने हरीश राणा मामले में इच्छामृत्यु को मंजूरी दी. ठीक ऐसे ही मुंबई में आनंद दीक्षित का मामला देश की सियासत और समाज को एक बार फिर जीवन और मौत के बीच फंसे मरीजों की कठिन स्थिति की याद दिला रहा है. 35 वर्षीय आनंद दो साल से अधिक समय से पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं. उनका शरीर जीवित है, लेकिन जीवन जैसे थम सा गया है. 

यह कहानी 29 दिसंबर 2023 की है. आनंद दीक्षित उस दिन अपनी नई खरीदी हुई स्कूटर पर सवार थे. पर यह खुशी का पल उन्हें भारी दर्द में बदल गया. इस हादसे में आनंद गंभीर रूप से घायल हो गए और अब उन्हें मशीनों और ट्यूबों के जरिए ही खाना दिया जाता है और सांस लेने में मदद मिलती है. 24 घंटे उनकी देखभाल कर रहे अर्जुन प्रजापति कहते हैं कि पिछले 18 महीनों में एक भी संकेत नहीं मिला, न कोई हाथ दबाने की प्रतिक्रिया, न कोई शब्द, न कोई आंखों का इशारा.

आर्थिक संकट और घर की बरबादी
आनंद के परिवार पर वित्तीय दबाव बहुत बड़ा है. अब तक उनके मेडिकल बिल्स 4 करोड़ रुपए पार कर चुके हैं. परिवार ने अपना जमीन और सारी बचत बेच दी है. इसी बीच, मुंबई में उनके घर को बीएमसी ने ध्वस्त कर दिया. बीएमसी की यह कार्रवाई लंबे समय से चले आ रहे कानूनी या स्ट्रक्चरल विवाद का परिणाम थी. परिवार को अपने बच्चे की सुरक्षा और इलाज के लिए किराए के घर में रहना पड़ा. 

देश को याद दिलाता है हरिश राणा का केस
इस मुद्दे ने पहले भी देश का ध्यान खींचा था, जब हरिश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उनके लिए इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी. आनंद दीक्षित का परिवार अभी भी अपने बेटे की जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद में है और यह कहानी समाज को यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि ऐसे मरीजों के अधिकार और परिवार की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए.

आनंद की मां हर दिन उनकी घड़ी और फोन तैयार रखते हुए चमत्कार की उम्मीद में हैं. वे कहती हैं, मैं बस उसके चमत्कार का इंतजार कर रही हूं. कमरे में सन्नाटा है, लेकिन मां की उम्मीद और भारी है. परिवार का कहना है कि उनका मामला यह भी दिखाता है कि जब तक मेडिकल और इंश्योरेंस कानूनों में बदलाव नहीं होंगे, वेजिटेटिव स्टेट हर परिवार के लिए एक मौत जैसी स्थिति है.

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