आजकल बाजार में मिलने वाले कई खाद्य पदार्थों की तरह घी में भी मिलावट की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं. ऐसे में शुद्ध और गुणवत्ता वाला घी खरीदना लोगों के लिए एक चुनौती बन गया है. अक्सर लोगों के लिए यह समझना भी मुश्किल हो जाता है कि जो घी वे खरीद रहे हैं, वह वास्तव में शुद्ध है या नहीं. आयुर्वेद के अनुसार घी शरीर के लिए लाभकारी होता है और इसमें ट्रांस फैट नहीं पाया जाता.
भारत में सदियों से घी बनाने की एक पारंपरिक विधि चली आ रही है. इस प्रक्रिया में सबसे पहले दूध से दही जमाया जाता है. इसके बाद दही को मथकर मक्खन निकाला जाता है और अंत में उस मक्खन को पकाकर घी तैयार किया जाता है. यह तरीका समय लेने वाला जरूर है, लेकिन इससे बनने वाला घी अधिक पौष्टिक और शुद्ध माना जाता है. आधुनिक जीवनशैली और समय की कमी के कारण अब इस पारंपरिक विधि का इस्तेमाल कम होता जा रहा है.
आधुनिक तरीकों ने बदली घी बनाने की प्रक्रिया
आजकल कई जगह दूध से सीधे मलाई इकट्ठा करके घी बनाया जाता है. इस प्रक्रिया में दही जमाने और मथने वाला चरण शामिल नहीं होता. इसके कारण घी में वसा की मात्रा तो अधिक रहती है, लेकिन उसमें पारंपरिक तरीके से बने घी जितने पोषक तत्व नहीं होते. यही कारण है कि आयुर्वेद में इस विधि से बने घी को उतना लाभकारी नहीं माना गया है.
मिट्टी के बर्तन में धीमी आंच पर पकाने की परंपरा
पारंपरिक तरीके से बने घी को अक्सर मिट्टी के बर्तन या मटके में धीमी आंच पर पकाया जाता था. इस प्रक्रिया से घी का स्वाद बेहतर बनता था और यह पाचन के लिए भी आसान माना जाता था. जब दूध को पहले दही में बदला जाता है, तो उसमें मौजूद प्राकृतिक जीवाणु उसे अधिक पौष्टिक और पाचन के अनुकूल बना देते हैं. इसी दही से निकले मक्खन से तैयार घी में भी वही लाभकारी गुण मौजूद रहते हैं.
क्रीम से बना घी क्यों कम लाभकारी
जब घी सीधे मलाई या क्रीम से बनाया जाता है, तो उसमें दही जमाने की प्रक्रिया शामिल नहीं होती. इसके कारण घी की गुणवत्ता कम हो सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह से तैयार घी में वास्तविक घी के गुण कम और वसा की मात्रा अधिक होती है. ऐसे घी का ज्यादा सेवन करने से शरीर को कम पोषण देता है, और मोटापा या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.