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Swami Vivekananda: महिला सशक्तिकरण को लेकर थी स्वामी विवेकानंद की गजब की सोच, जानें ये 6 अनमोल विचार

gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 11 जनवरी 2026,
  • Updated 2:29 PM IST
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जहां स्त्री का सम्मान होता है वही घर स्वर्ग होता है. इन विचारों के साथ स्वामी विवेकानंद ने स्त्रियों को केवल शरीर तक सीमित नहीं किया, बल्कि उन्हें एक योद्धा के रूप में पुरुष के समान ही समाज के आगे पेश किया है. जानें क्या था स्वामी विवेकानंद जी का स्त्रियों को लेकर विचार.   
 

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स्वामी विवेकानंद का यह विचार स्त्री की आत्मनिर्भरता पर आधारित है. वह मानते थे कि किसी भी स्त्री की समस्याओं का स्थायी समाधान तभी संभव है, जब वह स्वयं निर्णय लेने और कार्य करने में सक्षम हो. कोई भी व्यक्ति, समाज या संस्था स्त्री के लिए उसके जीवन के फैसले नहीं ले सकती.
वह यह भी साफ कहते हैं कि भारतीय स्त्रियां किसी भी दृष्टि से कमजोर नहीं हैं. उन्हें केवल अवसर, विश्वास और समान अधिकार मिलने चाहिए. जब स्त्री को यह स्थान मिलता है, तब वह अपने जीवन को सही दिशा दे सकती है.

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इस विचार के माध्यम से स्वामी विवेकानंद आध्यात्मिक समानता का संदेश देते हैं, न केवल शारीरिक. उनके अनुसार आत्मा न स्त्री है, न पुरुष. आत्मा शुद्ध, एक और सभी के लिए समान है. समाज द्वारा बनाए गए स्त्री और पुरुष के भेद केवल शरीर और सामाजिक व्यवस्था तक सीमित हैं, आत्मिक स्तर पर ऐसा कोई अंतर नहीं है. जब यह समझ विकसित होती है, तब समानता, सम्मान और न्याय खुद ही स्थापित हो जाता है.

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उनका यह विचार अत्यंत गहरा सामाजिक सत्य को प्रस्तुत करता है. विवेकानंद कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति या वर्ग को अपनी शक्ति व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता, तो वह शक्ति नकारात्मक रूप ले लेती है.
स्त्री एक स्वाभाविक शक्ति है, लेकिन जब उसे दबाया जाता है, तो उसकी क्षमता विकृत हो जाती है. वह अपनी वास्तविक शक्ति का प्रयोग नहीं कर पाती. लेकिन जब उसका शोषण समाप्त होगा, तो वही स्त्री साहस, नेतृत्व और परिवर्तन की प्रतीक बनेगी.
 

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स्वामी विवेकानंद इस विचार में प्राचीन भारतीय संस्कृति की महानता को रेखांकित करते हैं. वह बताते हैं कि वैदिक काल में स्त्रियों को ज्ञान, धर्म और दर्शन में पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे. धर्म के क्षेत्र में कभी लिंग भेद नहीं था. स्त्रियां ऋषिकाओं के रूप में वेदों और उपनिषदों के गूढ़ सत्य सिखाती थीं. यह संदेश आज के समाज को अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा देता है.
 

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स्वामी जी का यह विचार समाज के संतुलन की बात करता है. विवेकानंद स्पष्ट रूप से कहते हैं कि स्त्री की स्थिति सुधारे बिना संसार का कल्याण असंभव है.
जैसे एक पक्षी एक पंख से उड़ नहीं सकता, वैसे ही समाज भी केवल पुरुषों के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता. स्त्री और पुरुष दोनों की समान भागीदारी से ही समाज प्रगति कर सकता है.

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इस विचार में स्वामी विवेकानंद समाज की वास्तविक उन्नति का मापदंड बताते हैं. वह कहते हैं कि जिस परिवार या देश में स्त्रियां दुखी हैं, जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां किसी भी प्रकार की प्रगति संभव नहीं है.
स्त्री का उत्थान सबसे पहली आवश्यकता है, क्योंकि वही परिवार, समाज और राष्ट्र की नींव होती है. जब स्त्री सशक्त होगी, तभी संपूर्ण समाज सशक्त बनेगा.

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