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Swami Vivekananda Birth Anniversary: उठो, जागो और लक्ष्य तक मत रुको... स्वामी विवेकानंद के वह विचार जो डर को ताकत में बदल देते हैं

gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 12 जनवरी 2026,
  • Updated 8:42 AM IST
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अगर बात आएगी युवा दार्शनिक, विचारक, आध्यात्मिक नेता और शानदार वक्ता की, तो सबसे पहला नाम आएगा इस युगों में पैदा होने वाले नरेंद्र का. वहीं नरेंद्र, जिन्होंने 1893 में शिकागो के एक मंच पर चढ़कर पूरे विश्व को आध्यात्म का नया पाठ पढ़ाया. जिन्हें लगभग 25 साल की उम्र के आसपास स्वामी की उपाधि मिली, और जिन्हें आज विश्व स्वामी विवेकानंद जी के नाम से जानता है. स्वामी जी का जन्म 12 जनवरी 1863 में कलकत्ता में हुआ था.

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स्वामी विवेकानंद के पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त था. विश्वनाथ जी कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकील थे. वहीं उनकी माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवी थीं, जो एक धार्मिक और गुणवान गृहिणी थीं. शुरुआत के दिनों में स्वामी विवेकानंद की मां उनकी आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत बनीं. वहीं 1881 में स्वामी जी की मुलाकात महान दार्शनिक रामकृष्ण परमहंस जी से हुई, जो मां काली के बहुत बड़े भक्त थे. वहीं से स्वामी जी के जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ.

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1984 में सरकार ने फैसला लिया कि स्वामी विवेकानंद की जयंती को हर साल 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस(National Youth Day) के रूप में मनाया जाएगा. National Youth Day का सबसे पहला आयोजन 12 जनवरी 1985 में किया गया. यह दिन युवाओं के सामर्थ्य को को समर्पित है. आइए स्वामी जी की जयंती पर उनके कुछ विचार को समझते हैं, जो अंधकार भरे जीवन में किसी प्रकाश से कम नहीं है. 
 

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"उठो! जागो! और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए."
स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि मनुष्य को सबसे पहले अपने भीतर की सुस्ती, डर और भ्रम से जागना चाहिए. केवल सपना देखना काफी नहीं है. जब तक लक्ष्य पूरा न हो जाए, तब तक निरंतर प्रयास करते रहना ही सच्ची साधना है. रुक जाना ही असली हार है. 
 

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"ब्रह्मांड की सारी शक्तियां हमारे अंदर ही होती हैं. यह हम ही हैं, जिन्होंने अपनी आंखों के सामने हाथ रखा है और रोते फिरते हैं कि सामने अंधेरा है."
विवेकानंद मानते थे कि मनुष्य कमजोर नहीं है, बल्कि वह अपनी ही शक्ति को पहचान नहीं पाता. हम स्वयं अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर अंधेरे की शिकायत करते हैं. जब व्यक्ति भीतर झांकता है, तो उसे समझ आता है कि जिस शक्ति को वह बाहर खोज रहा था, वह तो पहले से उसके अंदर मौजूद है.
 

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"किताबें बहुत हैं और समय बहुत कम. ज्ञान का रहस्य यह है कि जो जरूरी है केवल उसी को सीखो और उसी के हिसाब से जीना की कोशिश करो."
यह कथन आज के युग में और भी अधिक मायने रखता है. स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि ज्ञान का अर्थ हर चीज जान लेना नहीं है. असल में यह समझने में है कि जीवन के लिए क्या जरूरी है. जो जरूरी हो, उसी को सीखो और उसी ज्ञान को अपने आचरण में उतारो. ज्ञान वही सार्थक है जो जीवन को बेहतर बनाए.

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"जो कुछ भी तुम्हें कमजोर बनाता है, शारीरिक, बौद्धिक या मानसिक रुप से. उसे जहर की तरह त्याग दो. उसी में तुम्हारा कल्याण है."
यह विचार आत्म सुधार का सबसे सशक्त सूत्र है. विवेकानंद स्पष्ट कहते हैं कि चाहे कमजोरी शरीर की हो, मन की हो या सोच की. जो भी तुम्हें भीतर से तोड़ता है, उससे दूरी बनाना ही कल्याण का मार्ग है. अगर कोई व्यक्ति भी आपको तकलीफ दे रहा है तो उसे त्याग देना ही बेहतर है. 

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