महाराष्ट्र में गणेश उत्सव अब अंतिम पड़ाव पर है और 25 सितंबर को गणपति विसर्जन होना है. लेकिन विदर्भ के अकोला में इस बार गणपति विसर्जन के सामने एक अलग तरह की चुनौती खड़ी हो गई है. जिले में बारिश की कमी के कारण नदियों, तालाबों और जलाशयों का जलस्तर काफी नीचे चला गया है. अकोला में इस साल अब तक सामान्य बारिश की तुलना में सिर्फ 64 फीसदी बारिश दर्ज हुई है. यानी पिछले साल के मुकाबले करीब 36 फीसदी कम बारिश हुई है. करीब 50 दिनों से बारिश नहीं होने का असर अब गणेश विसर्जन पर भी दिखाई दे रहा है. ऐसे में प्रशासन ने बड़े गणेश पंडालों से अपील की है कि कम पानी वाली नदियों और घाटों में 15 से 20 फीट और उससे अधिक ऊंची प्रतिमाओं का विसर्जन न करें. कई गणेश मंडलों ने प्रशासन की इस अपील को स्वीकार करते हुए बड़ी प्रतिमाओं को अगले साल तक सुरक्षित रखने का फैसला किया है.
मोरना नदी का सूखा घाट, विसर्जन की चुनौती
अकोला के मोरना नदी स्थित गणेश घाट पर आमतौर पर गणेश विसर्जन के दौरान पानी और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ दिखाई देती है. लेकिन इस बार घाट की तस्वीर अलग है. कम पानी, विसर्जन कुंड, गणेश प्रतिमाएं और भक्तों की भीड़ के बीच बड़ी प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर सवाल खड़ा हो गया है. मोरना, पूर्णा, काटेपूर्णा, मन और महेश समेत कई नदियों में पानी का स्तर बेहद कम है. करीब 50 दिनों से बारिश नहीं होने के कारण इसका असर किसानों की खरीफ फसलों से लेकर शहर और ग्रामीण इलाकों की जल व्यवस्था तक दिखाई दे रहा है. अब सवाल यही है कि 15 से 20 फीट और उससे भी बड़ी गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन इतने कम पानी में आखिर कैसे किया जाए.
135 साल से ज्यादा पुराने विसर्जन जुलूस से भी अपील
इस जल संकट को देखते हुए 135 से भी पुराने गणेश विसर्जन जुलूस के प्रमुख एडवोकेट मोतीसिंह मोहता ने सभी पंडालों के पदाधिकारियों से मौजूदा हालात को देखते हुए बड़ी प्रतिमाओं का विसर्जन नहीं करने का आह्वान किया है. इस अपील के बाद अधिकतर गणेश पंडाल इस संकट को समझते हुए बड़ी प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने के विकल्प को स्वीकार करते नजर आ रहे हैं. अकोला में इस साल बारिश ने किसानों के साथ-साथ प्रशासन की भी चिंता बढ़ा दी है. जिले में अब तक करीब 64 फीसदी बारिश ही दर्ज हुई है और करीब 50 दिनों से बारिश नहीं हुई है. इसका सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ा है. कई इलाकों में सोयाबीन की फसल प्रभावित हुई है. कहीं उत्पादन कम होने की स्थिति है तो कहीं फसल खराब होने की शिकायतें सामने आ रही हैं. अब यही जल संकट गणेश विसर्जन के सामने भी बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है.
मोरना नदी में छोटी प्रतिमाओं के लिए विसर्जन कुंड
अकोला शहर के गणेश विसर्जन के प्रमुख स्थानों में से एक मोरना नदी का गणेश घाट है. लेकिन इस बार नदी में पानी का स्तर काफी कम है, जिसके चलते बड़ी प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर परेशानी सामने आ रही है. नगर निगम की ओर से हर साल की तरह इस बार भी घरेलू गणपति और छोटी प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए विसर्जन कुंड तैयार किया गया है. लेकिन बड़ी सार्वजनिक प्रतिमाओं के लिए स्थिति अलग है.
प्रशासन ने बड़ी प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने की अपील की
अकोला की जिलाधिकारी वर्षा मीणा ने गणेश मंडलों से बड़ी प्रतिमाओं को कम पानी वाले नदी-तालाबों में विसर्जित नहीं करने की अपील की है. उनके मुताबिक, जिले में इस समय जल उपलब्धता बहुत कम है. गणेश मंडलों से अनुरोध किया गया है कि बड़ी प्रतिमाओं का विसर्जन कम पानी वाले नदी-तालाबों में न करें. अगर संभव हो तो प्रतिमाओं को सुरक्षित रखा जाए और पर्याप्त पानी उपलब्ध होने के बाद विसर्जन किया जाए. प्रशासन का कहना है कि इससे जलस्रोतों पर दबाव कम होगा और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होगा.
15 से 20 फीट की प्रतिमाओं के सामने बड़ी चुनौती
अकोला शहर और जिले में इस बार सैकड़ों बड़ी गणेश प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं. इनमें कई प्रतिमाओं की ऊंचाई 15 से 20 फीट या उससे अधिक है. कम पानी में इन प्रतिमाओं का विसर्जन करना मुश्किल होगा. साथ ही प्रतिमा के पूरी तरह पानी में समाने में भी परेशानी हो सकती है. इसी वजह से प्रशासन ने गणेश मंडलों के साथ बैठक कर बड़ी प्रतिमाओं को विसर्जित करने के बजाय सुरक्षित रखने का विकल्प सामने रखा है.
37 साल से बड़ी प्रतिमा का विसर्जन नहीं करता विश्वकर्मा पंडाल
अकोला का विश्वकर्मा गणेश पंडाल इस मामले में पिछले 37 साल से एक अलग परंपरा निभा रहा है. पंडाल के अध्यक्ष राजू सोनाडिकर के मुताबिक, उनके यहां करीब 17 फीट की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है, लेकिन इस बड़ी प्रतिमा का विसर्जन नहीं किया जाता. पूजा के लिए स्थापित की जाने वाली छोटी प्रतिमा का ही विसर्जन किया जाता है. बड़ी प्रतिमा को पूरे साल सुरक्षित रखा जाता है. राजू सोनाडिकर के मुताबिक, पिछले 37 वर्षों से बड़ी गणेश प्रतिमा को सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है और अगले साल उसका रंग-रोगन करके फिर से उसी प्रतिमा की स्थापना की जाती है. इस बार जल संकट को देखते हुए उन्होंने दूसरे गणेश मंडलों से भी बड़ी प्रतिमाओं को विसर्जित करने के बजाय सुरक्षित रखने की अपील की है.
उन्होंने यह भी प्रस्ताव रखा है कि जिन गणेश मंडलों के पास बड़ी प्रतिमा रखने के लिए जगह नहीं है, वे अपनी प्रतिमाएं उनके खेत में बने गोदाम में सुरक्षित रख सकते हैं. उनका कहना है कि अगर करीब 300 से अधिक बड़ी प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने की जरूरत पड़ी तो वे अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करने के लिए तैयार हैं.
15 फीट के बप्पा का विसर्जन नहीं करेगा शिवाजी महाराज पंडाल
अकोला के देशमुखपेठ स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज गणेश पंडाल ने भी इस बार बड़ी प्रतिमा का विसर्जन नहीं करने का फैसला लिया है. यहां करीब 15 फीट की प्रतिमा स्थापित की गई है. पंडाल पदाधिकारियों का कहना है कि मौजूदा जल संकट को देखते हुए प्रतिमा को विसर्जित करने के बजाय सुरक्षित रखा जाएगा. पदाधिकारी राहुल के मुताबिक, इस साल 15 फीट की गणेश प्रतिमा स्थापित की गई है, लेकिन जल संकट को देखते हुए इसका विसर्जन नहीं करने का निर्णय लिया गया है. प्रतिमा को सुरक्षित रखा जाएगा और अगले साल इसका रंग-रोगन करके फिर से इसी प्रतिमा की स्थापना की जाएगी. उनका कहना है कि अगर दूसरे पंडाल भी ऐसा करते हैं तो पानी और पर्यावरण दोनों की बचत होगी.
गणेश मंडलों के साथ बैठक में हुई अपील
प्रशासन की अपील के बाद गणेश मंडलों के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गई है. सार्वजनिक गणेश विसर्जन शोभायात्रा के अध्यक्ष एडवोकेट मोती सिंह मोटा ने भी गणेश मंडलों के पदाधिकारियों के साथ हुई बैठक में बड़ी प्रतिमाओं को कम पानी में विसर्जित नहीं करने की अपील की. उनका कहना है कि कम पानी में बड़ी प्रतिमा का विसर्जन करना पर्यावरण और प्रतिमा दोनों के लिए उचित नहीं होगा.
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