लौटने जा रही है 1500 साल पुरानी परंपरा, अंबाजी में स्थापित होगा 16 फुट ऊंचा अखंड शक्ति त्रिशूल

आज की पीढ़ी के सामने है भक्ति का नया रंग, लेकिन परंपरा है 1500 साल पुरानी. जानें क्या है वह परंपरा?

भव्य और दिव्य त्रिशूल स्थापित किया जाएगा
gnttv.com
  • अंबाजी,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:17 PM IST

गुजरात के प्रसिद्ध शक्तिपीठ अंबाजी के इतिहास में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जुड़ने जा रहा है. अंबाजी के निकट स्थित त्रिशूलिया घाट पर 1500 साल पुरानी अखंड शक्ति परंपरा के तहत एक भव्य और दिव्य त्रिशूल स्थापित किया जाएगा. यह पहल आस्था, सुरक्षा और आध्यात्मिक चेतना को मजबूत करने की भावना से की गई है.

त्रिशूलिया घाट पर स्थापित होगा 16 फुट ऊंचा त्रिशूल
त्रिशूलिया घाट पर स्थापित होने वाला यह अखंड शक्ति त्रिशूल 16 फुट ऊंचा और लगभग 600 किलोग्राम वजनी होगा. यह केवल एक धातु संरचना नहीं, बल्कि शक्ति और भक्ति का जीवंत प्रतीक माना जा रहा है. यह त्रिशूल श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बनेगा और घाट की पहचान को और मजबूत करेगा.

उत्तरकाशी की परंपरा से प्रेरित है यह त्रिशूल
इस त्रिशूल की प्रेरणा उत्तराखंड के उत्तरकाशी स्थित विश्वनाथ मंदिर के पास भागीरथी नदी किनारे स्थापित माता आद्यशक्ति के प्राचीन त्रिशूल से ली गई है. वह त्रिशूल सदियों से अखंड आस्था का प्रतीक रहा है. अंबाजी में स्थापित होने वाला त्रिशूल उसी परंपरा की प्रतिकृति है, जिसे अब नए स्वरूप में पुनर्जीवित किया जा रहा है.

धार्मिक मान्यता और पौराणिक महत्व
पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया था, तब माता जगदंबा त्रिदेवों के तेज से प्रकट हुईं. भगवान शिव द्वारा प्रदान किए गए त्रिशूल से उन्होंने महिषासुर का वध किया. उसी विजय और धर्म की स्थापना के प्रतीक रूप में त्रिशूलिया घाट पर इस शक्तिस्तंभ की स्थापना की जा रही है.

श्रद्धालुओं की सुरक्षा और आत्मविश्वास बढ़ाने का उद्देश्य
त्रिशूलिया घाट का मार्ग श्रद्धालुओं के लिए खड़ी चढ़ाई और कठिन भू-भाग वाला माना जाता है. यहां पहले कई बार अकस्मात की घटनाएं भी सामने आई हैं. मान्यता है कि माताजी की अदृश्य सुरक्षा यहां सदैव रहती है. 16 फुट ऊंचे त्रिशूल की स्थापना से यात्रियों में आध्यात्मिक शक्ति, निर्भीकता और आत्मविश्वास का संचार होगा और यात्रा मार्ग अधिक सुरक्षित बनेगा.

दीपेश पटेल का संकल्प और सोच
जय भोले ग्रुप के दीपेश पटेल, जिन्होंने इस त्रिशूल के निर्माण का संकल्प लिया, बताते हैं कि घाट का नाम त्रिशूलिया होने के बावजूद वहां त्रिशूल का कोई प्रतीक नहीं था. इसी सोच से यह विचार जन्मा, ताकि घाट की आध्यात्मिक पहचान बनी रहे और वहां हो रही परेशानियों व दुर्घटनाओं में कमी आए. अब यह त्रिशूल अंबाजी के त्रिशूलिया घाट पर स्थापित होकर आस्था का स्थायी केंद्र बनेगा.

आस्था और सेवा भाव से बनी योजना
यह संपूर्ण परियोजना श्री आरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट (SAAMDT) और अहमदाबाद के जय भोले ग्रुप के संयुक्त प्रयास से साकार हो रही है. आने वाले वर्षों में यह स्थल लाखों श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा, विश्वास और शक्ति का प्रमुख केंद्र बनेगा.
 

(रिपोर्ट- ब्रिजेश दोशी)

 

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