असम दौरे के दूसरे दिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुवाहाटी में बड़ा फैसला लिया है. अमित शाह ने पूरे असम से अफस्पा हटाने की बात कही है. मोदी सरकार के 8 साल के कार्यकाल में राज्य के 23 जिलों यानी 60 फीसदी हिस्से से यह हटाया जा चुका है. गृहमंत्री ने कहा कि असम में 1990 में विशेष सशस्त्र बल कानून AFSPA लागू किया गया था. इसके बाद उसे 7 बार बढ़ाया गया. लेकिन पीएम मोदी के 8 साल के कार्यकाल में हम असम को अफस्पा मुक्त राज्य बनाने में जुटे हैं. तो चलिए आज आपको बताते हैं कि ये अफस्पा कानून है क्या और क्यों पड़ी थी इसकी जरूरत?
क्या है AFSPA कानून?
सुरक्षा और शांति के पैमानों पर कई मामलों में ये एक्ट सुरक्षा बलों को असीमित अधिकार देता है. इस एक्ट के तहत असम के जिन राज्यों में AFSPA लागू है वहां पर सेना बिना किसी वारंट के किसी भी नागरिक की जांच कर सकती है. किसी के घर, दुकान, संस्थान की तलाशी भी ली जा सकती है. इस एक्ट के तहत आर्मी को पावर दी जाती है कि वो शक के आधार पर किसी भी संदिग्ध ठिकाने को तबाह कर सकते हैं. इतना ही नहीं इस एक्ट के तहत सुरक्षाकर्मी बिना किसी वारंट के किसी को भी गिरफ्तार कर सकते हैं. पूर्वोत्तर राज्यों के अलावा कश्मीर में भी ये एक्ट लागू है.
हमेशा से होता रहा है इस कानून का विरोध
AFSPA को लेकर नॉर्थ-ईस्ट में समय-समय पर आंदोलन होते रहे हैं. जिसमें सबसे अहम आंदोलन रहा है, पूर्वोत्तर की आयरन लेडी कही जाने वाली इरोम शर्मिला का. दरअसल नवंबर 2000 में एक बस स्टैंड के पास सुरक्षाबलों ने 10 लोगों को गोली मार दी थी, जिसके बाद 29 वर्षीय इरोम ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी. करीब 16 दिनों बाद उन्होंने अपना अनशन तोड़ा. उसके बाद राजनीति में आने के लिए उन्होंने चुनाव भी लड़ा, लेकिन वो चुनाव हार गईं.
जब महिलाओं ने किया था न्यूड प्रदर्शन
कई मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इस एक्ट का दुरुपयोग किया जाता है. उनका कहना है कि सुरक्षाबल अपने असीमित अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं. साल 2004 में महिलाओं ने इस एक्ट के खिलाफ न्यूड प्रदर्शन किया था. जिसके बाद मणिपुर में तैनात असम राइफल्स के जवान पर महिला के गैंगरेप का आरोप लगा था. कई संगठनों के अलावा आम नागरिक भी इस एक्ट को हटाने के लिए विरोध करते रहते हैं.