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Bagaha News: सिस्टम को दिखाया आईना! जब 50 साल में सरकार नहीं बना पाई पुल, तो बगहा के ग्रामीणों ने चंदे के पैसों से खड़ा कर दिया 60 फीट लंबा लोहे का पुल

बगहा के शिवपुर कॉलोनी के ग्रामीणों ने 50 साल तक पुल का इंतजार करने के बाद चंदा और श्रमदान से ढाई लाख रुपये में 60 फीट लंबा लोहे का पुल बना दिया. इस पहल ने जहां हजारों लोगों की परेशानी दूर की, वहीं सरकारी व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़ा कर दिया है.

गांव वालों ने खुद बनाया 60 फीट का पुल
अभिषेक पाण्डेय
  • बगहा,
  • 12 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 5:38 PM IST

बगहा से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास के दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. करीब 50 साल तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाने के बावजूद जब पहाड़ी नदी पर पुल नहीं बन सका, तो पूरे गांव ने खुद कमान संभाल ली. रामनगर प्रखंड के सोनखर पंचायत स्थित शिवपुर कॉलोनी के लोगों ने चंदा जुटाया, दिन-रात श्रमदान किया और करीब ढाई लाख रुपये की लागत से 60 फीट लंबा लोहे का पुल बना दिया. यह सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि ग्रामीणों की एकजुटता, जिद और आत्मनिर्भरता की मिसाल है. साथ ही यह उस व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है, जो आधी सदी में लोगों को एक पुल तक नहीं दे सकी. आज इस अनोखी पहल की चर्चा पूरे इलाके में हो रही है.

50 साल इंतजार... फिर गांव ने खुद लिखी विकास की कहानी
रामनगर प्रखंड के सोनखर पंचायत स्थित शिवपुर कॉलोनी के लोग पिछले करीब 50 वर्षों से पहाड़ी नदी पर स्थायी पुल बनाने की मांग कर रहे थे. ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और संबंधित विभाग के अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला. बरसों तक फाइलें आगे नहीं बढ़ीं और पुल का सपना अधूरा ही रह गया. आखिरकार ग्रामीणों ने तय किया कि अब सरकारी इंतजार नहीं करेंगे, बल्कि अपनी समस्या का समाधान खुद निकालेंगे.

चंदा और श्रमदान से ढाई लाख रुपये में तैयार किया 60 फीट लंबा पुल
गांव के लोगों ने आपसी सहयोग से चंदा जुटाने का अभियान शुरू किया. किसी ने 100 रुपये दिए, किसी ने हजारों रुपये का सहयोग किया, तो कई लोगों ने मजदूरी करने के बजाय श्रमदान किया. कुछ लोगों ने लोहे और अन्य निर्माण सामग्री की व्यवस्था भी कराई. करीब ढाई लाख रुपये की लागत और कई दिनों की मेहनत के बाद ग्रामीणों ने अपने हाथों से पहाड़ी नदी पर करीब 60 फीट लंबा मजबूत लोहे का पुल तैयार कर दिया. यह पुल आज गांव की एकजुटता और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गया है.

हजारों लोगों की जिंदगी हुई आसान, बरसों की परेशानी खत्म
हर साल बारिश के दौरान पहाड़ी नदी उफान पर आ जाती थी और बांस-बल्ली से बना अस्थायी चचरी पुल बह जाता था. इसके बाद स्कूली बच्चों, किसानों, महिलाओं, बुजुर्गों और मरीजों को जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती थी. कई बार मरीज समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते थे और बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती थी. अब लोहे का स्थायी पुल बनने के बाद गांव का संपर्क पूरे साल बना रहेगा. खेती-किसानी, शिक्षा, इलाज और रोजमर्रा की आवाजाही पहले की तुलना में काफी आसान हो गई है.

ग्रामीणों ने पेश की मिसाल, लेकिन सिस्टम पर भी उठे बड़े सवाल
शिवपुर कॉलोनी के लोगों ने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों और पूरा गांव एकजुट हो जाए, तो बड़े से बड़ा काम भी किया जा सकता है. लेकिन यह घटना सरकारी व्यवस्था और विकास के दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है. जिस पुल का निर्माण सरकार को करना चाहिए था, उसे ग्रामीणों ने अपने पैसे और मेहनत से बनाकर तैयार कर दिया. यह सिर्फ आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानी नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने वाली ऐसी मिसाल भी है, जो बताती है कि बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों को आज भी खुद आगे आना पड़ रहा है.
 

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