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World Famous Bastar Dussehra: 75 दिनों तक चलने वाले दशहरा की अनूठी परंपरा, राजपरिवार और आदिवासियों के सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक है यह पर्व

विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की 600 साल पुरानी 'बाहर रैनी' रस्म श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई गई. राजा कमलचंद्र भंजदेव कुम्हड़ाकोट पहुंचे, जहां मां दंतेश्वरी को नए धान की खीर अर्पित कर नवाखानी रस्म पूरी की गई. इसके बाद आठ पहियों वाले विशाल विजय रथ को राजमहल वापस लाया गया.

Bastar Dussehra Bahar Raini Ritual
धर्मेंद्र महापात्र
  • बस्तर,
  • 22 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:16 PM IST

छत्तीसगढ़ के बस्तर में विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी परंपराएं आज भी निभाई जा रही हैं. भीतर रैनी की रस्म के बाद अब बाहर रैनी का आयोजन किया गया. इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य राजा कमलचंद्र भंजदेव विशाल विजय रथ लेकर राजमहल लौटे. करीब 600 साल पुरानी इस परंपरा में आस्था, आदिवासी संस्कृति और राजपरिवार के ऐतिहासिक संबंधों की झलक देखने को मिलती है. 

बस्तर दशहरा की परंपरा के अनुसार, भीतर रैनी के दौरान ग्रामीण विजय रथ को अपने कब्जे में ले लेते हैं. इसके बाद बाहर रैनी के मौके पर रथ को वापस लाने की रस्म निभाई जाती है. इसी परंपरा के तहत राजा कमलचंद्र भंजदेव पारंपरिक लाव-लश्कर के साथ कुम्हड़ाकोट पहुंचे. यहां माड़िया आदिवासी समुदाय के ग्रामीणों के साथ नवाखानी की परंपरा निभाई गई.

नए धान की खीर मां दंतेश्वरी को चढ़ाई गई
कुम्हड़ाकोट में नवाखानी की रस्म के दौरान नए धान से खीर तैयार की गई. इसे मां दंतेश्वरी को अर्पित किया गया. इसके बाद राजा कमलचंद्र भंजदेव और ग्रामीणों ने नवाखानी का प्रसाद ग्रहण किया. इस परंपरा में नए धान से तैयार भोजन को मां को अर्पित करने और फिर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की रस्म निभाई जाती है.

नवाखानी की रस्म पूरी होने के बाद मां दंतेश्वरी के छत्र को विजय रथ पर विराजित किया गया. इसके बाद आठ पहियों वाले विशाल रथ को वापस जगदलपुर लाया गया. बाहर रैनी के साथ बस्तर दशहरा की एक और महत्वपूर्ण परंपरा पूरी हुई, जिसमें ग्रामीणों और राजपरिवार की भागीदारी देखने को मिली.

आदिवासी समाज और राजपरिवार के जुड़ाव का प्रतीक है
बस्तर दशहरा की बाहर रैनी केवल धार्मिक रस्म तक सीमित नहीं है. यह आदिवासी समाज और बस्तर राजपरिवार के बीच सदियों से चले आ रहे सांस्कृतिक जुड़ाव, आपसी विश्वास और सामाजिक समरसता को भी दर्शाती है. इस आयोजन में परंपराओं के साथ स्थानीय आदिवासी संस्कृति और राजपरिवार के ऐतिहासिक संबंधों की झलक मिलती है.

75 दिनों तक चलता है बस्तर दशहरा
देश के दूसरे हिस्सों में दशहरा पर्व के दौरान रावण दहन की परंपरा प्रचलित है, लेकिन बस्तर दशहरा अपनी अलग पहचान रखता है. यहां दशहरा उत्सव 75 दिनों तक चलता है और इस दौरान कई विशिष्ट परंपराओं का निर्वहन किया जाता है. अपनी अनूठी रस्मों और आदिवासी संस्कृति से गहरे जुड़ाव के कारण बस्तर दशहरा देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है.
 

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