हिंदी दिवस 2026 के मौके पर देशभर में हिंदी के प्रचार-प्रसार की बात हो रही है. वहीं मध्य प्रदेश में मेडिकल शिक्षा को हिंदी से जोड़ने का करीब चार साल पुराना प्रयोग अब सवालों के घेरे में है. सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर हिंदी में MBBS की किताबें तैयार कराईं, लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक पिछले तीन वर्षों में किसी विद्यार्थी ने पूरी थ्योरी परीक्षा हिंदी माध्यम से नहीं लिखी.
2022 में शुरू हुआ था हिंदी MBBS का प्रयोग
साल 2022 में मेडिकल शिक्षा को भारतीय भाषाओं से जोड़ने की पहल शुरू हुई थी. मध्य प्रदेश इस दिशा में आगे बढ़ने वाला पहला राज्य बना. तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर MBBS की किताबों को हिंदी में उपलब्ध कराने का काम शुरू किया गया. इसके लिए करीब 300 मेडिकल विशेषज्ञों, डॉक्टरों और अनुवादकों की टीम तैयार की गई. MBBS के शुरुआती वर्ष के प्रमुख विषयों की किताबों का हिंदी में अनुवाद कराया गया.
10 करोड़ रुपये खर्च, 50 हजार किताबें प्रकाशित
इस योजना पर करीब 10 करोड़ रुपये खर्च किए गए और लगभग 50 हजार हिंदी मेडिकल किताबें प्रकाशित की गईं. दूसरे राज्यों ने भी इस पहल में रुचि दिखाई. बिहार सरकार ने भी इन किताबों की खरीद की. हालांकि, किताबें तैयार होने के बाद विद्यार्थियों के बीच इन्हें लोकप्रिय बनाने और हिंदी में परीक्षा देने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ सकी.
हिंदी किताबें हैं, फिर भी परीक्षा अंग्रेजी में
सबसे बड़ा सवाल यही है कि हिंदी में किताबें उपलब्ध होने के बावजूद विद्यार्थी MBBS की थ्योरी परीक्षा अंग्रेजी में ही देना पसंद कर रहे हैं. रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में किसी विद्यार्थी ने पूरी थ्योरी परीक्षा हिंदी में नहीं लिखी. भोपाल के मेडिकल बुक पब्लिशर मनीष जैन के मुताबिक, मेडिकल शिक्षा लंबे समय से अंग्रेजी पर आधारित रही है. ऐसे में विद्यार्थियों के लिए अचानक हिंदी में पढ़ाई और परीक्षा शुरू करना आसान नहीं है. कई छात्रों को यह भी डर रहता है कि हिंदी में परीक्षा देने से कम अंक मिल सकते हैं या भविष्य में नौकरी और करियर पर इसका असर पड़ सकता है.
मेडिकल शब्दावली भी बड़ी चुनौती
मेडिकल साइंस की जटिल शब्दावली को हिंदी में समझने लायक बनाना आसान नहीं है. इसी वजह से कई विद्यार्थी अंग्रेजी की मूल किताबों को प्राथमिकता देते हैं. मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई और शिक्षण व्यवस्था में भी अंग्रेजी का दबदबा बना हुआ है. हालांकि, रतलाम मेडिकल कॉलेज से इस प्रयोग की एक सकारात्मक तस्वीर सामने आई है. मनीष जैन के मुताबिक, वहां डीन की सक्रियता के चलते करीब 80 फीसदी विद्यार्थियों तक हिंदी में अनुवादित MBBS की किताबें पहुंची हैं. मध्य प्रदेश में हिंदी में उत्तर लिखने का विकल्प भी मौजूद है और हिंदी माध्यम चुनने वाले छात्रों को परीक्षा शुल्क में करीब 50 फीसदी तक छूट मिलने की व्यवस्था बताई गई है.
सिर्फ किताबें छापना काफी नहीं
मध्य प्रदेश का यह प्रयोग बताता है कि मेडिकल शिक्षा को हिंदी से जोड़ने के लिए सिर्फ किताबें उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है. विद्यार्थियों के करियर का भरोसा, शिक्षकों का प्रशिक्षण, मेडिकल शब्दावली, मूल्यांकन व्यवस्था और कॉलेज प्रशासन का सहयोग भी जरूरी है. हिंदी दिवस पर यह प्रयोग एक बड़ा सवाल छोड़ता है कि हिंदी को मेडिकल शिक्षा में विकल्प बनाने के बाद उसे छात्रों की वास्तविक पसंद बनाने के लिए अब और क्या कदम उठाए जाने चाहिए.
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