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BRICS Summit: ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने का भारत के पास मौका, कुगेलमैन बोले- सहमति बनाना मुश्किल

BRICS बिजनेस फोरम के लीडर्स सेशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जब दुनिया में व्यापारिक बाधाएं बढ़ रही हैं, तब भारत आर्थिक सेतु बनाने का काम कर रहा है.

BRICS Summit
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 12 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 11:15 AM IST

अमेरिकी और दक्षिण एशिया मामलों के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने 18वें BRICS शिखर सम्मेलन को भारत के लिए वैश्विक नेतृत्व मजबूत करने का अहम मौका बताया है. उनका कहना है कि दुनिया में राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता बढ़ रही है. ऐसे समय में BRICS विकासशील देशों के लिए वैश्विक व्यवस्था में एक वैकल्पिक मंच के तौर पर अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है. भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां शिखर सम्मेलन आयोजित हो रहा है.

ग्लोबल साउथ से जुड़ाव बढ़ाने का मौका
कुगेलमैन के मुताबिक, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को लेकर ग्लोबल साउथ के कई देशों में असंतोष बढ़ा है. आर्थिक अनिश्चितता, व्यापारिक बाधाएं और अलग-अलग क्षेत्रों में बढ़ते संघर्षों ने स्थिति को और जटिल बनाया है. ऐसे समय में BRICS विकासशील देशों की आवाज को ज्यादा मजबूती से सामने रख सकता है.

उन्होंने कहा कि भारत के लिए यह सम्मेलन सिर्फ BRICS की बैठक नहीं है, बल्कि ग्लोबल साउथ के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने का अवसर भी है. भारत की विदेश नीति में ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ाव को महत्वपूर्ण प्राथमिकता माना जाता है.

विस्तार से बढ़ी ताकत, लेकिन मुश्किल भी
BRICS अब पहले के मुकाबले काफी बड़ा समूह हो चुका है. इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और UAE शामिल हैं. हालांकि, सऊदी अरब की पूर्ण सदस्यता की स्थिति अलग है और वह अलग स्तर पर भागीदारी कर रहा है. कुगेलमैन का मानना है कि समूह के विस्तार से उसकी वैश्विक अहमियत बढ़ी है, लेकिन इसके साथ सहमति बनाना भी मुश्किल हुआ है. अलग-अलग देशों के हित और विदेश नीति के रुख कई मुद्दों पर एक-दूसरे से काफी अलग हैं.

साझा बयान पर टिकी सम्मेलन की सफलता
कुगेलमैन के मुताबिक, भारत के लिए इस सम्मेलन की सफलता का एक बड़ा पैमाना ठोस और व्यापक संयुक्त बयान जारी कर पाना होगा. इसके लिए सभी सदस्य देशों के बीच सहमति बनाना जरूरी है. इस चुनौती का संकेत मई में ही मिल चुका है. नई दिल्ली में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में ईरान और UAE के बीच मतभेदों के चलते संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका था.

ईरान-UAE तनाव भारत के लिए चुनौती
इस बार सबसे बड़ी मुश्किल पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर साझा रुख बनाने की है. BRICS में ईरान और UAE दोनों सदस्य हैं, लेकिन ईरान के साथ UAE के संबंध इस संघर्ष के दौरान बेहद तनावपूर्ण रहे हैं. कुगेलमैन के मुताबिक, भारत को ऐसा संतुलित रुख तैयार करना होगा जिसे ईरान और UAE दोनों स्वीकार कर सकें. यही संयुक्त बयान तैयार करने की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है.

अमेरिका को लेकर भी भारत की परीक्षा
दूसरी चुनौती अमेरिका को लेकर है. रूस और ईरान BRICS के संयुक्त बयान में अमेरिका की नीतियों की कड़ी आलोचना वाली भाषा शामिल कराने की कोशिश कर सकते हैं. चीन भी कुछ मुद्दों पर ऐसी भाषा का समर्थन कर सकता है. लेकिन भारत के लिए स्थिति अलग है. नई दिल्ली अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रही है. ऐसे में भारत ऐसा कोई रुख नहीं चाहेगा जिससे वॉशिंगटन के साथ उसके संबंधों पर असर पड़े. कुगेलमैन के अनुसार, भारत के लिए BRICS में रहते हुए अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखना अहम कूटनीतिक परीक्षा है.

मोदी बोले- व्यापार बाधाओं के बीच भारत बना रहा आर्थिक सेतु
BRICS बिजनेस फोरम के लीडर्स सेशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जब दुनिया में व्यापारिक बाधाएं बढ़ रही हैं, तब भारत आर्थिक सेतु बनाने का काम कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत ने अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी सप्लाई चेन को ज्यादा विविध और भरोसेमंद बनाया है. मोदी ने यह भी कहा कि वैश्विक व्यापार के लिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा, खुले सप्लाई रूट और नाविकों की सुरक्षा जरूरी है. भारत की BRICS अध्यक्षता का विषय Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability है.

भारत के लिए इस सम्मेलन का लक्ष्य केवल आर्थिक सहयोग बढ़ाना नहीं, बल्कि BRICS को ज्यादा व्यावहारिक और समाधान देने वाला मंच बनाना भी है. ऐसे में नई दिल्ली को एक तरफ ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करनी है, तो दूसरी तरफ अलग-अलग हितों वाले सदस्य देशों के बीच सहमति भी बनानी है.

 

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