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40 साल पहले शुरू हुई थी कहानी, आज CRPF की ‘लेडी कमांडो’ देश के हर मोर्चे पर तैनात

CRPF में महिला बटालियन की शुरुआत 40 साल पहले हुई थी. एक बटालियन से हुई शुरुआत आज 6 बटालियन तक पहुंच गई है. महिलाएं आज देश के महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्रों में तैनात हैं. 25 सितंबर को वीरांगनाओं का सम्मान होगा.

CRPF Women Warriors
जितेंद्र बहादुर सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 22 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:00 PM IST

वर्दी पहनकर देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालना, मुश्किल हालात में ऑपरेशन का हिस्सा बनना, आतंकवाद और नक्सलवाद के खिलाफ मोर्चे पर खड़ा होना और जरूरत पड़ने पर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देना, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी CRPF की महिला जवानों ने पिछले 40 साल में इन सभी भूमिकाओं को निभाते हुए लंबी और ऐतिहासिक यात्रा तय की है. आज जब CRPF की महिला जवानों को फ्रंटलाइन पर तैनात देखा जाता है, RAF की महिला टीमें भीड़ नियंत्रण संभालती हैं और बस्तरिया बटालियन नक्सल प्रभावित इलाकों में ऑपरेशन का हिस्सा बनती है, तो इसके पीछे चार दशक लंबी कहानी है. इस कहानी की शुरुआत 1986 में हुई थी, जब CRPF ने देश की पहली महिला कॉम्बैटेंट बटालियन खड़ी की. अब इस ऐतिहासिक सफर के 40 साल पूरे हो रहे हैं. इसी मौके पर 25 सितंबर 2026 को CRPF विशेष समारोह आयोजित कर अपनी सेवारत और पूर्व महिला कर्मियों को सम्मानित करेगा.

साल 1986 में रखी गई थी नींव-
चार दशक पहले जब सुरक्षा बलों में महिलाओं की भूमिका आज की तरह व्यापक नहीं थी, उस समय CRPF ने महिला कॉम्बैटेंट बटालियन का गठन कर एक नई शुरुआत की. एक बटालियन से शुरू हुआ यह प्रयोग धीरे-धीरे पूरे संगठन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी में बदल गया. CRPF के मुताबिक, आज उसके पास छह पूरी तरह महिला बटालियन हैं, जिन्हें देश के महत्वपूर्ण सुरक्षा क्षेत्रों में तैनात किया गया है. यानी 40 साल पहले जिस कदम को एक शुरुआत के तौर पर देखा गया था, वह आज CRPF की ऑपरेशनल क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है.

महिला बटालियन से आगे बढ़ी भूमिका-
CRPF में महिलाओं की भूमिका अब केवल महिला बटालियन तक सीमित नहीं है. रैपिड एक्शन फोर्स यानी RAF की हर यूनिट में चार महिला टीमें तैनात हैं. इनका इस्तेमाल खास तौर पर भीड़ नियंत्रण और काउंटर-रायट ड्यूटी में किया जाता है. यानी संवेदनशील कानून-व्यवस्था की परिस्थितियों में भी महिला कर्मी सीधे ऑपरेशनल जिम्मेदारी निभा रही हैं. इससे भी आगे महिला कर्मियों की तैनाती उन इलाकों में हुई है, जहां सुरक्षा बलों के सामने हथियारबंद उग्रवाद की चुनौती रही है. बस्तरिया बटालियन इसका बड़ा उदाहरण है. लेफ्ट विंग एक्सट्रीमिज्म प्रभावित क्षेत्रों में तैनात यह यूनिट CRPF की उन कोशिशों का हिस्सा है, जिनमें महिला कर्मियों को भी फ्रंटलाइन जिम्मेदारियों में शामिल किया गया है.

नक्सल प्रभावित इलाकों में भी निभाई भूमिका-
CRPF की महिला कर्मियों ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी अपनी जिम्मेदारियां निभाई हैं. महिला बटालियन की कर्मियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर और दंतेवाड़ा जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में भी सेवा की है. ऐसे इलाकों में ड्यूटी का मतलब केवल कैंप में तैनाती नहीं होता. जंगल, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां, लगातार ऑपरेशनल अलर्ट और उग्रवाद की चुनौती के बीच सुरक्षा बलों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होती है. महिला कर्मियों की इन क्षेत्रों में तैनाती ने यह भी दिखाया कि कठिन ऑपरेशनल परिस्थितियों में उनकी भूमिका लगातार बढ़ाई जा सकती है.

CRPF की महिला शक्ति की कहानी बलिदान की भी-
साल 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले के दौरान CRPF की कांस्टेबल कमलेश कुमारी ने सर्वोच्च बलिदान दिया. उनके साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया. CRPF के मुताबिक, कमलेश कुमारी बल की एकमात्र अशोक चक्र प्राप्तकर्ता हैं. उनका नाम CRPF की महिला योद्धाओं की उस विरासत का हिस्सा है, जिसमें ड्यूटी को सबसे ऊपर रखा गया.

श्रीलंका से कश्मीर तक वीरता की मिसाल-
CRPF की महिला कर्मियों ने भारत ही नहीं, बल्कि विदेशी ऑपरेशनल असाइनमेंट में भी अपनी क्षमता साबित की. 1988 में श्रीलंका के एलीफेंट पास चेक पोस्ट पर कांस्टेबल विमला देवी और लांस नायक राजवंती देवी ने महत्वपूर्ण ऑपरेशनल भूमिका निभाई. विमला देवी को सेना मेडल और राजवंती देवी को आर्मी चीफ कमेंडेशन मिला.

साल 2001 में श्रीनगर एयरपोर्ट पर हुए आतंकी हमले के दौरान कांस्टेबल बिंदु कुमरे ने भी असाधारण बहादुरी दिखाई. उन्हें उनकी वीरता के लिए सम्मानित किया गया.

इन नामों के जरिए CRPF की महिला कर्मियों की चार दशक की यात्रा में साहस और बलिदान के कई अध्याय दिखाई देते हैं.

जम्मू-कश्मीर में भी बढ़ी भूमिका-
महिला कर्मियों की भूमिका समय के साथ सुरक्षा अभियानों के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंची है. जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाकों में भी महिला सुरक्षा कर्मियों की मौजूदगी कई तरह की ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करती है. विशेष रूप से तलाशी अभियानों के दौरान स्थानीय महिलाओं से बातचीत, महिला नागरिकों की तलाशी और सुरक्षा बलों के साथ समन्वय जैसी परिस्थितियों में महिला कर्मियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. इस तरह महिला कर्मियों की तैनाती केवल महिला केंद्रित जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ऑपरेशन की जरूरत के अनुसार उनकी भूमिका तय होती है.

विशेष कमांडो भूमिकाओं में भी बढ़ी भागीदारी-
CRPF की महिला शक्ति का एक महत्वपूर्ण अध्याय विशेष कमांडो भूमिकाओं से भी जुड़ा है. समय के साथ महिला कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण और कठिन ऑपरेशनल जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया गया है. इसका उद्देश्य सुरक्षा अभियानों में महिलाओं की भागीदारी को और व्यापक बनाना है.

जंगल और उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में काम करने वाली विशेष इकाइयों में महिलाओं की भागीदारी इस बदलती भूमिका की तस्वीर पेश करती है. यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सुरक्षा बल में महिलाओं की मौजूदगी कितनी है, बल्कि यह भी है कि उन्हें किस तरह की जिम्मेदारियां दी जा रही हैं.

40 साल में बदली पूरी तस्वीर-

  • 1986 में पहली महिला कॉम्बैटेंट बटालियन. 
  • फिर महिला बटालियनों का विस्तार. 
  • RAF में महिला टीमें. 
  • नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में महिला कर्मियों की तैनाती. 
  • बस्तरिया बटालियन में फ्रंटलाइन भूमिका. 
  • और अलग-अलग चुनौतीपूर्ण ऑपरेशनल जिम्मेदारियों में महिलाओं की भागीदारी. 

यह पूरी यात्रा बताती है कि CRPF में महिलाओं की भूमिका पिछले चार दशकों में किस तरह बदली है।CRPF के अनुसार, पिछले 40 वर्षों में महिला कर्मियों ने देश के अलग-अलग हाई-स्टेक्स ऑपरेशनल थिएटर में सेवा दी है. आज CRPF में छह विशेष महिला बटालियन हैं. इसके अलावा RAF की प्रत्येक यूनिट में चार महिला टीमें तैनात हैं. बस्तरिया बटालियन जैसी फ्रंटलाइन यूनिट में भी महिला कर्मियों की भूमिका है.

25 सितंबर को सम्मान की बारी-
अब इस चार दशक की यात्रा के उन चेहरों को सम्मानित करने की तैयारी है, जिन्होंने CRPF की इस कहानी को आगे बढ़ाया. 25 सितंबर 2026 को आयोजित होने वाले विशेष समारोह में CRPF के महानिदेशक और CRPF फैमिली वेलफेयर एसोसिएशन की अध्यक्ष की मौजूदगी में सेवारत और पूर्व महिला कर्मियों को सम्मानित किया जाएगा. इन महिला कर्मियों को उनके योगदान और बलिदान के लिए सम्मानित किया जाएगा. यह समारोह उन महिलाओं के प्रति सम्मान का प्रतीक होगा, जिन्होंने CRPF में रहते हुए देश की सुरक्षा व्यवस्था में अपनी भूमिका निभाई.

एक बटालियन से छह बटालियन तक-
CRPF की महिला शक्ति की यह कहानी 1986 में एक बटालियन से शुरू हुई थी. आज चार दशक बाद छह महिला बटालियन, RAF की महिला टीमें और विभिन्न फ्रंटलाइन ऑपरेशनल भूमिकाएं इस सफर की तस्वीर पेश करती हैं.

इस यात्रा में कमलेश कुमारी का सर्वोच्च बलिदान है, श्रीलंका में ऑपरेशन की कहानी है, कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ मोर्चे पर बहादुरी है और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चुनौतीपूर्ण ड्यूटी निभाने वाली महिला जवानों का साहस भी है.

25 सितंबर को जब इन महिला कर्मियों को सम्मानित किया जाएगा, तो यह सिर्फ एक समारोह नहीं होगा. यह उन चार दशकों की कहानी को सलाम करने का अवसर होगा, जिसमें CRPF की महिलाओं ने सुरक्षा बलों में अपनी भूमिका का लगातार विस्तार किया. 1986 में शुरू हुआ सफर आज 40 साल बाद ऐसे मुकाम पर है, जहां CRPF की महिला जवान संगठन की कई महत्वपूर्ण ऑपरेशनल जिम्मेदारियों का हिस्सा हैं. चार दशक की यह यात्रा सेवा, साहस, बलिदान और बदलती भूमिकाओं की कहानी है.

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