EXCLUSIVE: बचपन में कूड़ा बीना....सड़क किनारे फूल बेचे……..अब शुरू की ऐसी मैगजीन जिसे चला रहे हैं झुग्गी झोपड़ियों वाले बच्चे,आज कर रही हैं हजारों बच्चों के सपने पूरे

वॉयस ऑफ स्लम इस वक्त 3 प्रोग्राम पर काम कर रहा है. पहला है, ब्रीच प्रोग्राम. इसमें हम हर साल ऐसे 100 बच्चों को ढूंढा जाता है जो आज तक कभी स्कूल नहीं गए हैं. और फिर उन्हें इस वॉयस ऑफ स्लम स्कूल में एडमिशन दिया जाता है. यहां डेढ़ साल तक उसे पढ़ाया जाता है. उसे इस तरह से तैयार किया जाता है जैसे कोई पांचवी क्लास का बच्चा.  उसके बाद उन्हें आगे भेजा जाता है. कुछ बच्चे इंग्लिश मीडियम में जाते हैं तो कुछ हिंदी मीडियम स्कूल में. इस प्रोग्राम में 75% फीस वॉयस ऑफ स्लम स्पॉन्सर करता है. 

Voice of Slum के माध्यम से हजारों बच्चों के सपने पूरे कर रहे हैं चांदनी और देव
अपूर्वा सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 03 जनवरी 2022,
  • अपडेटेड 11:57 AM IST
  • Voice of Slum के माध्यम से हजारों बच्चों के सपने पूरे कर रहे हैं चांदनी और देव
  • 18 साल की उम्र में शुरू किया वॉयस ऑफ स्लम
  • देश की पहली मैगज़ीन है Slum Post जिसे चला रहे हैं स्लम के बच्चे

रेड लाइट या सड़क के किनारे फूल या पेन बेचते बच्चे को देखकर आपके मन में सबसे पहले क्या ख्याल आता है? क्या आपने कभी इन बच्चों की आंखों में देखा है? झुग्गी झोपड़ियों में रह रहे इन बच्चों के सपने भी दूसरे सभी बच्चों जैसे ही हैं. ये भी डॉक्टर बनना चाहते हैं, टीचर, साइंटिस्ट, इंजीनियर, पायलट और बहुत कुछ… लेकिन कुछ लोग हैं जो उनकी आंखों में बुनते सपनों को पूरा करने के लिए जी जान लगाए हुए हैं. 

चांदनी और देव उन्हीं में से एक हैं और उन्हीं के बीच से निकले हैं….ये दोनों वॉयस ऑफ स्लम नाम की एक संस्था चला रहे हैं, जिसकी मदद से आज तक ये हजारों बच्चों की मदद कर चुके हैं. और सबसे खास बात ये इन्हीं बच्चों के बीच से निकले हैं.

GNT Digital ने वॉयस ऑफ स्लम की फाउंडर चांदनी से उनके पूरे सफर, सपने और आगे के प्लांस के बारे में बात की. पढ़ते हैं बातचीत के मुख्य अंश….  

चांदनी जब 5 साल की थी तब वे अपने पिता के साथ खेल-तमाशा करने अलग-अलग शहर जाया करती थीं. जब वे दिल्ली आयीं तो उनके पिता की मृत्यु हो गई. घर में सबसे बड़ी थी तो उन्होंने 7 साल की उम्र में कूड़ा बीनना शुरू कर दिया. सड़कों पर फूल बेचे, भुट्टा बेचा और घर चलाया. वे बताती हैं, “शुरू से ही मुझे पढ़ने का बहुत शौक था और सबसे ज्यादा स्कूल ड्रेस पहनने का. जब सुबह-सवेरे बच्चों को यूनिफॉर्म में स्कूल जाते देखती थी, तब बहुत अच्छा लगता था कि काश एक दिन मैं भी ऐसे जा पाऊं.”  

चांदनी ने बताया कि वो समय ऐसा था कि कूड़ा बीनने वाले लोगों को थाने में बंद कर दिया जाता था. लेकिन कूड़ा बिन्ना ही रोजी-रोटी थी तो वे लोग दिन की जगह रात में चले जाया करते थे. वे कहती हैं, “एक दिन जब मुझे पुलिस ने पकड़ा तो थाने में बंद कर दिया. मैं रात भर जेल में बंद रही. परिवार के लोग पुलिस से डरते थे तो मुझे कोई भी छुड़ाने नहीं आया.”

पिछले कई साल से चला रहे हैं संस्था

 बच्चों के अधिकारों के बारे में जाना, तो काम करने का सोचा

इसके कुछ साल बाद चांदनी ने बढ़ते कदम नाम का एक संगठन ज्वाइन किया, वे लोग बस स्टैंड पर बच्चों को पढाते थे. वहां पर उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की. उन्होंने वहां पहली बार बच्चों के अधिकारों के बारे में जाना. इन्हें और करीब से समझने के लिए चांदनी ने संगठन के साथ काम करना शुरू कर दिया. 18 साल तक वे 18,000 बच्चों के लिए काम कर चुकी थीं. चांदनी ने GNT को बताया, “ अधिकारों के बारे में सीखने के लिए मैंने उनके साथ रहना शुरू कर दिया. सोचा कि इसके बारे में और जानना चाहिए कि बच्चों के राइट्स क्या होते हैं और किस तरह काम करते हैं. मैंने अपने जैसे बच्चों के लिए काम करना शुरू किया. कई सालों तक मैं उनके साथ काम करती रही. 

चांदनी कर चुकी हैं हजारों बच्चों के लिए काम

 18 साल की उम्र में शुरू किया वॉयस ऑफ स्लम 

जब 18 साल की हुईं तो उन्होंने और को-फाउंडर देव ने के वॉयस ऑफ स्लम शुरू करने का सोचा. चांदनी की तरह ही देव भी उन्हीं झुग्गियों से निकले हैं. चांदनी बताती हैं, “मेरी और देव दोनों की यात्रा स्लम से ही रही है. उन्होंने भी अपना पूरा बचपन रेलवे स्टेशन पर गुजारा है. तो हमारे पास न ज्यादा शिक्षा थी और न ही साधन. जब हमने ये डिसाइड किया कि हम ये संस्था शुरू करेंगे और अपने जैसे बच्चों के लिए काम करेंगे, तब हमें बहुत से लोगों ने डिमोटिवेट किया. लोग अक्सर कहा करते थे कि तुम वो चीज बांटने जा रहे हो जो चीज तुम्हारे पास है ही नहीं. कैसे काम करोगे? लेकिन मन में एक दृढ़ विश्वास था कि हम जिन चीजों से गुजरे हैं उन सबसे इन बच्चों को नहीं गुजरने देना ही. तभी हमने वॉयस ऑफ स्लम को शुरू किया.” 

स्कूल में पढ़ते बच्चे

 किस तरह से करता है वॉयस स्लम काम?

चांदनी ने बताया कि वॉयस ऑफ स्लम इस वक्त 3 प्रोग्राम पर काम कर रहा है. पहला है, ब्रीच प्रोग्राम. इसमें हम हर साल ऐसे 100 बच्चों को ढूंढा जाता है जो आज तक कभी स्कूल नहीं गए हैं. और फिर उन्हें इस वॉयस ऑफ स्लम स्कूल में एडमिशन दिया जाता है. यहां डेढ़ साल तक उसे पढ़ाया जाता है. उसे इस तरह से तैयार किया जाता है जैसे कोई पांचवी क्लास का बच्चा.  उसके बाद उन्हें आगे भेजा जाता है. कुछ बच्चे इंग्लिश मीडियम में जाते हैं तो कुछ हिंदी मीडियम स्कूल में. इस प्रोग्राम में 75% फीस वॉयस ऑफ स्लम स्पॉन्सर करता है. 

इसके आफ्टर स्कूल प्रोग्राम चलाया जाता है. इसमें जिन बच्चों के स्कूल में एडमिशन हो गए हैं, हम उन बच्चों को ग्रेजुएशन तक सपोर्ट किया जाता है. 

चांदनी ने बताया, “लॉकडाउन से हम एक और प्रोजेक्ट 'फीड द स्लम' चला रहे हैं. इसमें हम हर दिन 500 से 1000 बच्चों को खाना खिलाते हैं. इसमें वो बच्चे आते हैं जो पढ़ना तो चाहते हैं लेकिन उनके पास न्यूट्रिशन वाला खाना नहीं है, या वो इसे अफोर्ड नहीं कर सकते. वो भी हम बच्चों को देते हैं. 

फीड द स्लम प्रोग्राम

 अभी तक कर चुके हैं 800 से अधिक बच्चों के साथ काम 

चांदनी और देव पिछले 7-8 साल से काम कर रहे हैं. वे अभी 370 बच्चों के साथ काम कर रहे हैं, 800 बच्चों के साथ काम कर चुके हैं. चांदनी कहती हैं, “एक बच्चा जब स्लम से निकलता है तो वो अपने आने वाली जनरेशन को वहां नहीं रखेगा, वो अपने पूरे परिवार को वहां से निकाल लेगा.यही हम चाहते हैं. ये बच्चे अपने पूरे परिवार को वहां से निकाल लें. मैं और देव भी इन्हीं झुग्गी-झोपड़ियों से निकले हैं, अगर हम करते हैं तो ये सभी बच्चे भी कर सकते हैं.”

टूटे… थके..…ठहरे……और फिर चल पड़े

चांदनी कहती हैं कि ये सफर आसानी नहीं रहा. एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि अब नहीं होगा, हम कुछ वक्त ठहरे और फिर उसी जज्बे के साथ इन हजारों बच्चों के सपनों को पंख देने में लग गए. वे कहती हैं, “शुरुआती दौर में जितना भी पैसा हमने जोड़ा हुआ था, मेरा, मम्मी का, मेरी दीदी का. वो सारे पैसा वॉइस ऑफ स्लम में लगा चुके थे. मेरी दीदी की 50 हजार की एफडी भी मेरे नाम पर थी, मैंने उसे भी तोड़कर वॉयस ऑफ स्लम के सपनों को पूरा करने में लगा दिया.”

चांदनी और देव

 वे आगे कहती हैं, “एक समय ऐसा आया जब हमारे पास सब खत्म हो चुका था. मैंने और देव ने जॉब करने का सोचा, इंटरव्यू दिया और क्लियर हो गया. नौकरी पर जाने से एक दिन पहले फिर लगा की एक आखिरी बार ट्राई करते हैं. हमने एक मैसेज बनाया और सोशल मीडिया पर डाल दिया. इसमें लोगों से 1 रुपए डोनेट करने की अपील की गई थी. आपको जानकर हैरानी होगी कि हमें केवल 5-7 हजार की जरूरत थी, लेकिन हमारे पास 1-2 घंटे में ही 10 हजार तक का डोनेशन आ गया था. हमें उस वक़्त इतनी हिम्मत मिली और हमें विश्वास हुआ कि हम ये कर सकते हैं क्योंकि हजारों लोग हैं जो हमपे भरोसा करते हैं.”

दिन में बच्चों को पढ़ाया और रात में पैसे कमाने के लिए बेचीं पेंटिंग

चांदनी और देव दोनों ही दिन में बच्चों को पढ़ाने जाते थे और फिर रात में हैंडमेड प्रोडक्ट जैसे पेंटिंग वगैरह बेचा करते थे. चांदनी आंसुओं वाली आंखों के साथ भरी हुई आवाज़ में कहती हैं, "जब हमारे पास पैसे नहीं होते थे, तब हम पेट भरने के लिए 10 रुपए के गोलगप्पे खाते थे और उन्हें बोलते थे कि इसमें ढेर सारे आलू भर दीजिये, ताकि हमारा पेट भर जाए. वो जो समय था वो बहुत कुछ सिखाकर गया. हमें बहुत गर्व होता है कि आज हम बच्चों के लिए इतना सब कर पा रहे हैं. आने वाले कुछ सालों में जब हमारे बच्चे ग्रेजुएट हो जाएंगे और नौकरी पा जाएंगे तो हमें और भी खुशी होगी.” 

पूर्व राष्ट्रपति के साथ वॉयस ऑफ स्लम

देश की पहली मैगजीन, जो चलाते हैं स्लम के बच्चे

इन सबके इतर चांदनी ने बताया कि वॉयस ऑफ स्लम एक और मुहिम चलाता है, वो है ‘स्लम पोस्ट’ (Slum Post Magazine). ये एक तरह का मीडिया प्लेटफार्म है. इसे स्लम के बड़े बच्चे इसके एडिटर भी हैं और रिपोर्टर भी. वे सभी स्लम की न्यूज लाकर देते हैं कि वहां क्या चल रहा है. हम सबकुछ छापते हैं, अच्छा भी और बुरा भी. 

देश की पहली मैगज़ीन जिसे चला रहे हैं स्लम के बच्चे

चांदनी कहती हैं, “हमारे स्लम पोस्ट के बच्चों ने कुछ ऐसी केस स्टडीज सॉल्व की हैं जो आम इंसान नहीं कर पायेगा. एक दिन हमारे एक बच्चे ने न्यूज लाकर दी कि हमारे घर के पास एक बच्ची रहती है, वो घर में बंद रहती है, उसके चेहरे पर चोट के निशान हैं. उसका एक बच्चा भी है. फिर हमने उसपर जब चर्चा की तो पाया कि उसे वो लोग नेपाल से उठाकर लाए थे और बिहार के एक 40 साल के आदमी से उसकी शादी करवा दी थी. वो बच्ची जब 12 साल की थी तब उसे लेकर आये थे. उसके साथ उसका देवर, पति और ससुर सभी शारीरिक और मानसिक शोषण करते थे. जब हमें पता चला तो हमने उसकी मदद की और उसे घर उसके माता पिता के पास भेजा.”

इन बच्चों को दिखता है वॉयस ऑफ स्लम में अपना ‘फ्यूचर’

बच्चों की जिंदगी में वॉयस ऑफ स्लम कितना मायने रखता है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि वे इसमें अपना भविष्य देखते हैं. चांदनी ने जिक्र करते हुए बताया, “एक दिन बच्चे से किसी ने पूछा कि वॉयस ऑफ स्लम तुम्हारे लिए क्या है? उस बच्ची ने एकदम से कहा 'फ्यूचर' यानि भविष्य. उसने एक शब्द में बहुत बड़ी बात बोल दी. ये वक़्त मुझे बहुत खुश देता है. हमारा सपना है कि हम भारत के हर एक स्लम में काम करें. जो कि बहुत जल्द करेंगे. उससे पहले हम एक ऐसा स्कूल बनाना चाहते हैं जो फेलियर के लिए हो. जिन बच्चों को कहा जाता है कि ये बच्चा कुछ नहीं कर पायेगा, वही बच्चा करके दिखाएगा.” बता दें, वॉयस ऑफ स्लम इस वक्त नोएडा के कई स्लम में काम कर रहा है.
 

वॉयस ऑफ स्लम के बच्चे

झुग्गियों से बच्चों को बाहर निकालने के लिए करें ये सबसे जरूरी काम 

चांदनी ने जाते जाते लोगों से अपील की कि अगर वे किसी बच्चे को सचमें झुग्गी-झोपड़ियों से बाहर निकालना चाहते है और उन्हें मेनस्ट्रीम में लाना चाहते हैं, तो सबसे जरूरी है कि उन्हें पढ़ाया भी स्लम से बाहर ही जाए. वे कहती हैं, “उन्हें एक स्कूल में लाना पड़ेगा, जहां वे यूनिफॉर्म पहनें, और हर वो चीज फील कर पाए जो एक नार्मल बच्चा स्कूल में जाता हुआ करता है.”

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