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EXCLUSIVE: ये वीर नारियां हैं केसरिया रंग की असल हकदार….जिनके दम पर हंसते-हंसते शहीद हो जाते हैं देश के सैनिक

इस किताब को लिखने में स्वप्निल को पूरे 2 साल का समय लगा. वे बताती हैं कि इसे लिखना और पब्लिश करवाना इतना आसान नहीं था. वीर नारियों से उनके शहीद हुए पतियों के बारे में पूछना आसान नहीं था. स्वप्निल कहती हैं, “सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि ये किताब इंडियन डिफ़ेंस फोर्सेज पर थी, हमें हजारों चीज़ें ध्यान में रखनी होती हैं. आपको छोटी-छोटी चीज़ों और कॉन्फिडेंशियलिटी का ख्याल रखना पड़ता है."

Instagram: Swapnil Pandey Instagram: Swapnil Pandey
हाइलाइट्स
  • कहानी उन वीर नारियों को जो हैं केसरिया रंग की असल हकदार

  • शहीदों की जिंदगियों को करें सेलिब्रेट

  • इस किताब में 7 वीर नारियों को शामिल किया गया है

जरा सोचिए जब हम किसी शहीद की पत्नी या प्रेमिका की बात करते हैं तो हमारे जेहन में सबसे पहली तस्वीर क्या बनती है...रोती हुई...आसुओं से तर बतर....केसरिया रंग में लिपटे हुए वीरगति को प्राप्त अपने पति के शव पर विलाप करती हुई एक औरत. आर्मी में लोग सैनिकों के बारे में बातें करते हैं, उनके त्याग उनकी तपस्या के बारे में. लेकिन सरहद पर खड़े इन सैनिकों के पीछे जो फोर्स होती है वो होती हैं इनकी पत्नियां. वो वीर नारियां जिनके बलबूते ये सभी सैनिक घर-परिवार छोड़कर हंसते-हंसते शहीद हो जाते हैं. ये औरतें हर वक्त निष्ठा से खड़ी रहती हैं. 

हाल ही में इन्हीं महिलाओं/ वीर नारियों पर इंडियन डिफेंस पर लिखने वाली स्वप्निल पांडेय की किताब ‘फोर्स बिहाइंड डी फोर्सेज’ (The Force Behind the Forces) रिलीज हुई है. इसी किताब पर GNT ने स्वप्निल पांडेय से एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किया.....

The force Behind the forces
The force Behind the forces

चलिए पढ़ते हैं हमारी बातचीत के कुछ मुख्य अंश....

स्वप्निल किताब के इस टाइटल के बारे में कहती हैं कि मेन इन यूनिफार्म के पीछे जो वीमेन हैं उनकी तस्वीरें देश ने केवल रोते हुए देखी है. फोर्स बिहाइंड द फोर्सेज, जो हमारी आर्मी है उनके पीछे क्या और किसकी फोर्स है उनका जिक्र इस किताब में है. इसमें 7 वीर नारियों को शामिल किया गया है. इसमें सारिका गुलाटी की कहानी है. वे लेफ्टिनेंट कर्नल राजेश गुलाटी जो ध्रुव हेलीकॉप्टर क्रैश में वीर गति को प्राप्त हुए थे उनकी पत्नी हैं. इस कहानी का टाइटल ‘टू बॉडीज वन सोल’ रखा गया है. 

दूसरी कहानी जया महतो की है. जया एक जवान की पत्नी हैं और उनके पति नायक राज कुमार महतो एक एनएसजी कमांडो थे. स्वप्निल कहती हैं, “जया के पति कंधार हाईजैक में भी इन्वॉल्व थे, जया मजदूर का काम करती थी. आज वो एजुकेटर बन गयी हैं और ई-लर्निंग कंटेंट प्रोड्यूस करती हैं.”

तीसरी कहानी नितिका ढौंडियाल की है, जिनके बारे में काफी चर्चा हुई है. स्वप्निल बताती हैं कि नितिका की भी तस्वीर हमने रोते हुए ही देखी है, दूसरी तस्वीर उनकी तब देखी गयी जब उन्होंने यूनिफार्म पहनीं. उनके पति मेजर विभूति शंकर ढौंडियाल थे.

चौथी कहानी सुजाता दहिया की है जिनके पति को काउंटर इंसर्जेंसी ऑपरेशन में शेर कहा जाता था. वे राष्ट्रीय राइफल्स में थे. 

पांचवी तृप्ति नायर की कहानी भी लोगों को खूब पसंद आ रही है. वे डिसेबल्ड हैं. उनकी स्टोरी का टाइटल ‘एन एटरनल लव स्टोरी’ रखा गया है. उनके पति एक गोरखा सैनिक थे और दूसरों की जान बचाते हुए उन्होंने अपनी कुर्बानी दे दी थी. वहीं प्रिया सेमवाल की कहानी को भी इसमें शामिल किया गया है.

इसके साथ आखिर में कप्तान नवीन नगप्पा और सौम्या नगप्पा की कहानी को भी इसमें शामिल किया गया है. स्वप्निल कहती हैं, “ये इस पूरी किताब में अकेली ऐसी स्टोरी है जो हैप्पी एंडिंग वाली है.”  

"केसरिया के असली हकदार हमीं हैं"- जया महतो

स्वप्निल बताती हैं कि गांव और शहरों में रहने वाली महिलाओं की ज़िन्दगियों में काफी फर्क है. जमीन आसमान का फर्क. वे कहती हैं, "राजस्थान में आज भी कई गावों में छोटे-छोटे मकानों में एक कमरे में बंद होकर रह रही ये महिलाएं लोगों के लिए केवल एक 'विधवा' हैं. किताब में एक ऐसी ही कहानी है, जया महतो की. उनको डायन बता करके मारने की कोशिश की गयी थी. उनके पति कुछ ही दिन पहले इन्हीं लोगों की जान बचने के लिए शहीद हो गए और आज यही लोग उनकी पत्नी को डायन बता रहे हैं." 

जया महतो का जिक्र करते हुए स्वप्निल बताती हैं कि उनकी जमीन लेने के लिए डायन बताकर मारने की कोशिश की गयी थी. आज भी वे बाहर नहीं जा पाती हैं. उन्हें अपशगुन बोला जाता है और जन्मदिन और ख़ुशी के मौके पर आस पड़ोस में उन्हें नहीं बुलाया जाता क्योंकि वो एक "विधवा" हैं. जया महतो कहती हैं, “हमें सफेद रंग पहनने को बोला जाता है लेकिन केसरिया रंग के हकदार भी हमीं होते हैं. जब मेरे पति का शव आया था तब मुझे बताया गया था कि झंडे को कभी नहीं जलाते हैं, तो देश में अगर केसरिया का कोई हकदार है तो वो ये हम ही हैं, वीर नारियां". 

किताब लिखना नहीं था आसान

इस किताब को लिखने में स्वप्निल को पूरे 2 साल का समय लगा. वे बताती हैं कि इसे लिखना और पब्लिश करवाना इतना आसान नहीं था. वीर  नारियों से उनके शहीद हुए पतियों के बारे में पूछना आसान नहीं था. स्वप्निल कहती हैं, “सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि ये किताब इंडियन डिफ़ेंस फोर्सेज पर थी, हमें हजारों चीज़ें ध्यान में रखनी होती हैं. आपको छोटी-छोटी चीज़ों और कॉन्फिडेंशियलिटी का ख्याल रखना पड़ता है. जिन भी ऑपरेशन्स के बारे में लिखा है वे सब नए हैं, लेटेस्ट हैं, हाल फ़िलहाल हुए हैं, तो उनके कामरेड्स/ ब्रदर इन आर्म्स को ढूंढना जो उनके साथ थे, उनको कन्विंस करना बात करने के लिए, बहुत बड़ा काम था. इसके लिए एडीजीपीआई की पर्मिशन लेनी पड़ी. 1 एक स्टोरी के लिए मुझे ये सब करना पड़ता था. परमिशन लेने में ही 7 महीने लग गए थे.”  

शहीदों की जिंदगियों को करें सेलिब्रेट

स्वप्निल कहती हैं कि जो सैनिक अपने घर परिवार को छोड़कर बॉर्डर पर खड़े हैं और जिनको वीर गति मिली है, जिन्होंने आपकी रक्षा करते-करते अपनी जान गवां दी है, उनके प्रति आपकी भी जिम्मेदारी बनती है कि आप उनका ख्याल रखें. जब वो वीर नारियां बैंकों में आती हैं तब आप उन्हें लाइनों में मत खड़ा करिये, अस्पतालों में आएं तो उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट दीजिये, ठीक उसी तरह जिस तरह किसी नेता, राजनेता और सेलेब्रिटी को दी जाती है. \

वॉर विडोज असोसिएशन की प्रेजिडेंट दामयंती लाम्बा कहती हैं कि हम केवल अपने पतियों की ज़िन्दगी को सेलिब्रेट करना चाहते हैं कि लोग हमारे पतियों के बारे मेंबात करें, उन्हें जानें. जिस तरह से किसी भी नेता, राजनेता या सेलेब्रिटी को इज्जत दी जाती है ठीक उसी तरह इन शहीदों को मिलनी चाहिए.

कौन हैं स्वप्निल पांडेय? 

दरअसल, स्वप्निल की बात करें तो वे एक कॉर्पोरेट प्रोफेशनल थीं. लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, आर्मी पब्लिक स्कूल जैसे संस्थानों में पढ़ा चुकी हैं.  2016 में जब उरी अटैक हुआ तब एक वेलफेयर के दौरान उनकी मुलाकात एक महिला से हुई जिन्हें पति के शहीद होने के बाद उनके सास-ससुर ने घर से निकाल दिया था. स्वप्निल कहती हैं, "लिखने के लिए दर्द चाहिए होता है, जैसे रॉकस्टार मूवी का डॉयलोग है. उस दौरान जब पूरी मीडिया इंडस्ट्री आर्मी की बात कर रही थी तब कोई भी उन सैनिकों के पीछे परिवार और उनकी पत्निओं की बात नहीं कर रहा था. तब मैंने सोचा कि मुझे इनकी परिवारों और महिलाओं की बात लोगों तक पहुंचानी चाहिए". तबसे लेकर अभी तक स्वप्निल 3 किताबें लिख चुकी हैं. आज उनकी किताबें अमेजन पर बेस्ट सेलर में हैं और हजारों लोग उनका लिखा पढ़ रहे हैं. 

सचमुच वो औरत जिसने आपके आज के लिए अपना कल कुर्बान कर दिया. बस यही औरतें देशभक्ति की असल परिभाषा हैं. क्योंकि लोगों की भीड़ में सफेद रंग की साड़ी में दिख रही ये औरतें इस केसरिया रंग की सबसे बड़ी हकदार हैं.