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झांसी की माटी से जगमग होगी रामनगरी, झांसी के कुम्हार बना रहे एक लाख दीये, इलेक्ट्रॉनिक चाक ने बदली किस्मत

इस बार झांसी से करीब एक लाख दीये अयोध्या भेजने की तैयारी है. सात पीढ़ियों से दीये बनाने का काम कर रहे इन परिवारों के लिए यह सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि अपनी पुश्तैनी कला को आगे बढ़ाने का मौका भी है.

अयोध्या
अजय झा
  • झांसी ,
  • 04 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:32 PM IST

दीपावली पर अयोध्या की रामनगरी लाखों दीयों की रोशनी से जगमगाने वाली है. खास बात यह है कि इस बार इन दीयों में बुंदेलखंड की मिट्टी और वहां के कारीगरों की सालों पुरानी मेहनत भी शामिल होगी. झांसी के कुम्हार परिवार दीपावली के लिए दिन-रात मिट्टी के दीये तैयार कर रहे हैं. इस बार झांसी से करीब एक लाख दीये अयोध्या भेजने की तैयारी है. सात पीढ़ियों से दीये बनाने का काम कर रहे इन परिवारों के लिए यह सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि अपनी पुश्तैनी कला को आगे बढ़ाने का मौका भी है. कभी कम कमाई और ज्यादा मेहनत के कारण इस काम को छोड़ने की नौबत आ गई थी, लेकिन अब सरकारी मदद और बढ़ती मांग ने कारीगरों की जिंदगी में नई उम्मीद जगाई है.

सात पीढ़ियों से जारी है दीये बनाने की परंपरा
झांसी के दीपक कारीगर बृजलाल प्रजापति बताते हैं कि उनके परिवार में पिछले सात पीढ़ियों से मिट्टी के दीये बनाने का काम हो रहा है. उनके यहां तैयार होने वाले दीये बुंदेलखंड के अलावा उत्तर प्रदेश के कई जिलों और अयोध्या तक भेजे जाते हैं. पहले हाथ से चलने वाले चाक पर दीये बनाने में काफी मेहनत लगती थी. दिनभर काम करने के बाद भी उत्पादन कम होता था. ऐसे में परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता था. लेकिन श्रम विभाग की योजना के तहत योगी सरकार से इलेक्ट्रॉनिक चाक मिलने के बाद काम आसान हो गया है. अब कम समय में ज्यादा दीये तैयार हो रहे हैं और कारीगरों की मेहनत भी कम हुई है.

तीन-चार महीने पहले शुरू हो जाती है तैयारी
कारीगर प्रेम नारायण प्रजापति बताते हैं कि उनके परिवार में दीपावली की तैयारी तीन से चार महीने पहले ही शुरू हो जाती है. परिवार के सभी सदस्य मिलकर मिट्टी के दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, बुंदेलखंड की खास पहचान ग्वालिन और सजावट के दूसरे सामान बनाते हैं. इनकी सप्लाई झांसी के अलावा लखनऊ और अयोध्या तक होती है. उनके मुताबिक, राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अयोध्या में मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ी है. वहीं, चाइनीज सजावटी सामान से दूरी और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने के बढ़ते रुझान से भी स्थानीय कारीगरों को फायदा मिल रहा है. इलेक्ट्रॉनिक चाक की मदद से अब पहले के मुकाबले करीब दोगुना उत्पादन हो रहा है.


पूरे दिन में एक हजार दीये, अब कुछ घंटों में तैयार
कारीगर देवेंद्र प्रजापति बताते हैं कि पहले पारंपरिक चाक से पूरे दिन में मुश्किल से एक हजार दीये बन पाते थे. लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक चाक की मदद से महज दो से चार घंटे में एक हजार दीये तैयार हो जाते हैं. उनके यहां से झांसी और मध्य प्रदेश के अलावा अयोध्या भी दीये भेजे जाते हैं. अयोध्या के लिए करीब 50 हजार दीये भेजे जाते हैं.


स्वदेशी के बढ़ते रुझान से मिला रोजगार
कुम्हार परिवारों का कहना है कि मिट्टी के दीयों की बढ़ती मांग ने उनके पुश्तैनी कारोबार को नई जिंदगी दी है. इलेक्ट्रॉनिक चाक से उत्पादन बढ़ा है और आमदनी में भी सुधार हुआ है. इससे बच्चों की पढ़ाई और परिवार की जरूरतें पूरी करना आसान हुआ है. इस दीपावली झांसी के कारीगरों के हाथों से बने दीये जब अयोध्या को रोशन करेंगे, तो उनके साथ बुंदेलखंड की सात पीढ़ियों पुरानी कला और परंपरा भी चमकेगी.

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