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Jharkhand High Court Verdict: रात में किसी महिला के घर में घुसना या उसके कपड़े उठाना रेप की कोशिश नहीं- झारखंड हाई कोर्ट, 26 साल पुराने मामले को बताया गरिमा भंग करने का मामला

झारखंड हाईकोर्ट ने 1999 के एक मामले में कहा कि रात में महिला के घर में घुसकर कपड़े उठाना 'रेप का प्रयास' नहीं है. कोर्ट ने धारा बदलकर इसे महिला की गरिमा भंग करने का अपराध माना और पुराने सजा को पर्याप्त माना है.

Jharkhand High Court on Rape
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 08 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 1:35 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने 26 साल पुराने एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि रात के समय किसी महिला के घर में घुसना और उसके कपड़े उठाना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत रेप या रेप की कोशिश करने की श्रेणी का अपराध नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बदल दिया, जिसमें आरोपी को रेप की कोशिश के मामले में दोषी ठहराया गया था. हाईकोर्ट ने मामले को महिला की गरिमा भंग करने और आपराधिक बल के इस्तेमाल के अपराध के तौर पर माना है.

26 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट में हुई सुनवाई
यह मामला 1999 का है. पीड़िता की शिकायत के आधार पर 27 दिसंबर 1999 को एफआईआर दर्ज की गई थी. इसके बाद चाकुलिया पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और मामले की जांच शुरू की. पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी पिछली रात उसके घर में घुस आया था और उसके साथ रेप करने की कोशिश करते हुए उसके कपड़े उठाने का प्रयास किया था. शिकायत के बाद पुलिस ने मामले की जांच की. जांच पूरी होने पर पुलिस ने आरोपी को रेप की कोशिश का दोषी मानते हुए चार्जशीट दाखिल की. इसके बाद मामला ट्रायल कोर्ट पहुंचा, जहां आरोपी को दोषी ठहराया गया और सजा सुनाई गई.

2006 में मिली थी चार साल की सजा
घाटशिला सेशन कोर्ट ने 25 जुलाई 2006 को आरोपी को चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. इसके खिलाफ दोषी ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील दाखिल की. करीब 26 साल पुराने इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले और मामले में किए गए अपराध के स्वरूप पर दोबारा विचार किया. न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी अपराध को रेप की कोशिश मानने के लिए ऐसा स्पष्ट और वास्तविक कृत्य होना चाहिए, जो रेप किए जाने के बेहद करीब हो. कोर्ट ने कहा, 'रेप के अपराध को अंजाम देने के लिए पर्याप्त रूप से निकट कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य, भारतीय दंड संहिता के तहत रेप की कोशिश नहीं माना जाएगा.' यहां 'ओवरट एक्ट' यानी प्रत्यक्ष कृत्य का मतलब अपराध को अंजाम देने की योजना को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया वास्तविक और शारीरिक कदम है.

रेप की जगह महिला की गरिमा भंग करने का अपराध
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में बदलाव करते हुए मामले को महिला की गरिमा भंग करने और आपराधिक बल के इस्तेमाल के अपराध के तौर पर माना. यानी आरोपी को पहले जिस रेप की कोशिश के मामले में दोषी ठहराया गया था, हाईकोर्ट ने उस अपराध की प्रकृति को बदल दिया. कोर्ट ने यह फैसला 31 अगस्त को सुनाया था, जबकि इसका आदेश सोमवार को जारी किया गया.

आठ महीने की हिरासत को ही माना पर्याप्त
सजा में बदलाव करने के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी की पहले से काटी गई सजा को भी ध्यान में रखा. अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता ट्रायल के दौरान करीब आठ महीने हिरासत में रह चुका है. कोर्ट के मुताबिक, न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए इतनी अवधि की हिरासत पर्याप्त है. इस तरह हाईकोर्ट ने निचली अदालत की चार साल के कठोर कारावास की सजा को संशोधित कर दिया.

मामला शुरू कैसे हुआ था?
पूरे मामले की शुरुआत 27 दिसंबर 1999 को दर्ज हुई एफआईआर से हुई थी. महिला ने आरोप लगाया था कि आरोपी रात में उसके घर में दाखिल हुआ और रेप करने के इरादे से उसके कपड़े उठाने की कोशिश की. पुलिस ने शिकायत के आधार पर जांच की और आरोपी के खिलाफ रेप की कोशिश का मामला बनाते हुए चार्जशीट दाखिल कर दी थी. इसके बाद सेशन कोर्ट ने 2006 में उसे चार साल की सजा सुनाई.
 

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