बुधवार को दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश स्टे होटल में लगी भीषण आग में 21 लोगों की मौत हो गई. शुरुआती जांच में सामने आया कि होटल को केवल 6 कमरों की मंजूरी मिली थी, लेकिन इमारत की पांच मंजिलों में 25 से ज्यादा कमरे बना दिए गए थे. होटल के पास फायर NOC भी नहीं थी और आने-जाने का केवल एक ही रास्ता था.
उधर बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित प्रसाद अस्पताल के ICU में आग लगने से 3 मरीजों की मौत हो गई. आरोप है कि आग लगने के बाद अस्पताल का स्टाफ मरीजों को छोड़कर बाहर निकल गया. इन दोनों घटनाओं ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि फायर NOC, सुरक्षा ऑडिट और नियमों के बावजूद ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं.
NCRB के आंकड़े क्या बताते हैं?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की Accidental Deaths and Suicides in India (ADSI) 2024 रिपोर्ट के अनुसार देश में 2024 के दौरान आग की 5,971 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 5,888 लोगों की मौत हुई. यानी औसतन हर दिन 16 लोगों की जान आग की घटनाओं में गई.
भारत में आग की घटनाएं कोई नई समस्या नहीं हैं. 2005 से 2024 के बीच देश में 3.43 लाख से ज्यादा आग की घटनाएं दर्ज हुईं. इस दौरान हर साल औसतन 16 हजार से अधिक लोगों की मौत आग से जुड़ी दुर्घटनाओं में हुई.
आग लगने की सबसे बड़ी वजह क्या है?
NCRB के अनुसार 2024 में आग लगने की सबसे बड़ी वजह रसोई गैस सिलेंडर या चूल्हे से जुड़ी घटनाएं रहीं, जिनका हिस्सा करीब 22% रहा. इसके बाद शॉर्ट सर्किट और बिजली संबंधी खराबियां लगभग 17% घटनाओं के लिए जिम्मेदार रहीं. पुराने बिजली के तार, ओवरलोडेड वायरिंग, अवैध निर्माण, खराब रखरखाव और सुरक्षा मानकों की अनदेखी आग को बड़े हादसे में बदल देती है.
फायर NOC और ऑडिट के बावजूद हादसे क्यों नहीं रुक रहे?
कई मामलों में समस्या नियमों की कमी नहीं, बल्कि उनके पालन की कमी होती है. होटल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर, मॉल और अन्य व्यावसायिक भवनों में अक्सर क्षमता से अधिक लोगों को रखा जाता है. कई जगह आपातकालीन निकास बंद मिलते हैं या उनका उपयोग स्टोर रूम की तरह किया जाता है.
इसके अलावा कई इमारतों में फायर अलार्म, स्प्रिंकलर सिस्टम और अग्निशमन उपकरण या तो काम नहीं करते या नियमित रूप से उनकी जांच नहीं होती. कुछ संस्थान शुरुआती मंजूरी तो ले लेते हैं, लेकिन बाद में निर्माण में बदलाव कर देते हैं.
दिल्ली के होटल हादसे में भी मंजूरी से अधिक कमरे बनाए जाने और फायर NOC नहीं होने की बात सामने आई है. वहीं अस्पतालों में ICU जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बिजली उपकरण लगातार चलते रहते हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाता है.
अस्पताल और होटल सबसे ज्यादा संवेदनशील क्यों?
होटलों में अक्सर लोग भवन की संरचना से परिचित नहीं होते. आग लगने पर उन्हें बाहर निकलने का रास्ता ढूंढने में समय लग जाता है. दूसरी तरफ अस्पतालों में मरीज स्वयं चलने-फिरने की स्थिति में नहीं होते. ICU, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन सपोर्ट पर मौजूद मरीजों को निकालना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है. ऐसे में कुछ मिनट की देरी भी जानलेवा साबित हो सकती है.
अगर आग लग जाए तो अपनी जान कैसे बचाएं?
विशेषज्ञों के अनुसार आग लगने की स्थिति में घबराने के बजाय तुरंत कार्रवाई करना सबसे जरूरी है.
सबसे पहले फायर अलार्म सुनते ही भवन से बाहर निकलने की कोशिश करें.
लिफ्ट का इस्तेमाल बिल्कुल न करें, हमेशा सीढ़ियों का उपयोग करें.
धुआं ज्यादा हो तो झुककर या रेंगते हुए बाहर निकलें, क्योंकि साफ हवा नीचे रहती है.
मुंह और नाक को गीले कपड़े से ढक लें.
कमरे में फंस जाएं तो दरवाजे की दरारों को गीले कपड़े से बंद करें और खिड़की से मदद मांगें.
होटल या अस्पताल में ठहरते समय पहले ही इमरजेंसी एग्जिट का रास्ता देख लें.
किसी भी भवन में प्रवेश करते समय यह जरूर देखें कि वहां फायर एक्सटिंग्विशर और आपातकालीन निकास मौजूद हैं या नहीं.
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