Allahabad High Court: ग्रॉस सैलरी नहीं, अनिवार्य कटौतियों के बाद बची वास्तविक आय के आधार पर तय होगा तलाकशुदा महिला का भरण-पोषण, जानें हाई कोर्ट का ये फैसला

कानपुर देहात के एक मामले में फैमिली कोर्ट द्वारा तय 12 हजार रुपये मासिक मेंटेनेंस को बढ़ाकर हाईकोर्ट ने 20 हजार रुपये कर दिया. साथ ही स्पष्ट किया कि मेंटेनेंस की गणना ग्रॉस नहीं, बल्कि टैक्स और जरूरी कटौतियों के बाद बचने वाली नेट इनकम के आधार पर तय की जाएगी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ( PHOTO-ITG)
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 15 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 4:52 PM IST

पत्नी को मिलने वाले मेंटेनेंस को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने साफ कहा है कि पति की नेट सैलरी का 25 फीसदी हिस्सा मेंटेनेंस के तौर पर देना कोई तय नियम नहीं है. यह सिर्फ एक सामान्य मानक (Guideline) है. हर मामले के तथ्य और दोनों पक्षों की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए अदालत जरूरत पड़ने पर 25 फीसदी से ज्यादा या कम मेंटेनेंस भी तय कर सकती है.

कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने कहा कि मेंटेनेंस तय करने के लिए 25 फीसदी नेट इनकम का फॉर्मूला बाध्यकारी नहीं है. अदालत का काम हर मामले के तथ्यों को देखकर न्यायसंगत फैसला देना है. इसलिए अगर किसी मामले में परिस्थितियां अलग हैं तो कोर्ट 25 फीसदी से कम या उससे अधिक मेंटेनेंस भी तय कर सकती है.

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मेंटेनेंस तय करते समय "नेट इनकम" का मतलब पति की कुल (ग्रॉस) सैलरी नहीं, बल्कि टैक्स और अनिवार्य कटौतियों के बाद बचने वाली वास्तविक आय से है.

क्या था मामला?
यह मामला कानपुर देहात की फैमिली कोर्ट के एक आदेश से जुड़ा था. पत्नी ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए 12 हजार रुपये मासिक मेंटेनेंस को कम बताते हुए इसे बढ़ाने की मांग की थी. वहीं पति ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए मेंटेनेंस खत्म करने की मांग की थी. दोनों की ओर से अलग-अलग आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की गई थीं. सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पति ने पहले ही पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी, जिसमें उसे डिक्री मिल चुकी थी. इसके बावजूद पत्नी ने मेंटेनेंस बढ़ाने की मांग की थी.

मेंटेनेंस क्यों बढ़ाया?
हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद माना कि फैमिली कोर्ट की ओर से तय किया गया 12 हजार रुपये का मेंटेनेंस पत्नी के गुजारे के लिए पर्याप्त और न्यायसंगत नहीं था. इसलिए अदालत ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए मेंटेनेंस बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रति माह कर दिया. यह राशि मूल आवेदन दाखिल होने की तारीख से देय होगी. वहीं पति की याचिका खारिज कर दी गई.

बेंच ने इस बात पर भी गौर किया कि पति की ग्रॉस मंथली सैलरी 86,674 रुपये थी, जिसमें से काट-पीटकर 67,043 रुपये उसके बैंक अकाउंट में आ रहे थे. हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड में मौजूद दस्तावेजी सबूतों पर विचार किए बिना जल्दबाजी में गुजारा-भत्ते की रकम तय कर दी थी. जिसके बाद इस फैसले के उलट हाई कोर्ट ने नया फैसला दिया.

कोर्ट ने 25% वाले नियम पर क्यों दी सफाई?
हाईकोर्ट ने कहा कि कई फैसलों में पति की नेट इनकम के 25 फीसदी को मेंटेनेंस का आधार माना गया है, लेकिन इसे हर मामले में लागू होने वाला कानूनी नियम नहीं माना जा सकता. अदालत को हर केस में पति की आय, उसकी जिम्मेदारियां, पत्नी की जरूरतें और अन्य सभी परिस्थितियों का मूल्यांकन करना होता है. ऐसे में किसी एक तय प्रतिशत के आधार पर फैसला देना उचित नहीं होगा.

इस फैसले का क्या मतलब है?
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि मेंटेनेंस तय करने के लिए कोई निश्चित प्रतिशत लागू नहीं होगा. फैमिली कोर्ट और अन्य अदालतें हर मामले के तथ्यों के आधार पर फैसला लेंगी. जरूरत पड़ने पर पत्नी को पति की नेट इनकम के 25 फीसदी से ज्यादा मेंटेनेंस भी मिल सकता है और यदि परिस्थितियां अलग हों तो इससे कम भी तय किया जा सकता है. साथ ही अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि मेंटेनेंस की गणना करते समय पति की नेट इनकम को ही आधार माना जाएगा, न कि उसकी ग्रॉस सैलरी को.
 

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