दशहरी, चौसा, लंगड़ा का जलवा, आम की बंपर पैदावार की उम्मीद, विदेशों में निर्यात की तैयारी

प्रयागराज मंडल के तीन जिलों प्रयागराज, प्रतापगढ़ और कौशांबी में करीब 2400 से 2500 हेक्टेयर जमीन पर आम की खेती होती है. इस साल आम की पैदावार काफी अच्छी हो रही है. इस साल 1.5 लाख टन पैदावार की उम्मीद है.

Prayagraj Mango
gnttv.com
  • प्रयागराज,
  • 11 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:14 PM IST

आम को फलों का राजा कहा जाता है. यही वजह है कि हर साल आम के मौसम में रसीले आम का इंतजार आम के शौकीनों को रहता है. प्रयागराज के आम के शौकीनों के लिए इस बार अच्छी खबर है, क्योंकि प्रयागराज और प्रयागराज मंडल के जिलों में आम की पैदावार काफी अच्छी हो रही है. प्रयागराज जिले में खास तौर पर दशहरी, लंगड़ा, चौसा, सफेदा और आम्रपाली, वैरायटी के आम का उत्पादन होता है. लेकिन हाल के वर्षों में कुछ किसानों ने कुछ नई प्रजातियों रतौल, बॉम्बे ग्रीन, अंबिका अरूणिका और मल्लिका की भी बागवानी उत्पादन शुरू किया है.

आम की बंपर पैदावार-
खुसरो बाग स्थित औद्योगिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के प्रभारी विजय किशोर सिंह के मुताबिक इस बार आंधी तूफान से आम की फसल को कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है. इसके साथ ही आम की फसल में बौर भी अच्छे आए थे. जिससे इस बार आम की काफी अच्छी फसल होने की उम्मीद है. विजय किशोर सिंह के मुताबिक प्रयागराज के साथ ही प्रतापगढ़ के कुंडा का लंगड़ा व दशहरी आम और कौशांबी के सिराथू का फजली वैरायटी का आम भी काफी अच्छा होता है, जो यहां से बाहर भी भेजा जाता है.

3 जिलों में 2500 हेक्टेयर जमीन पर खेती-
प्रयागराज मंडल कि अगर बात करें तो मंडल के तीन जिलों प्रयागराज, प्रतापगढ़ और कौशांबी में लगभग 2400 से 2500 हेक्टेयर भूमि पर आम की खेती की जाती है. जिसमें कुल मिलाकर डेढ़ लाख टन आम का वार्षिक उत्पादन होता है. वहीं प्रयागराज की बात अगर करें तो प्रयागराज में अकेले 600 से 650 हेक्टेयर में आम की बागवानी होती है और प्रयागराज जिले में लगभग 10 हजार टन से अधिक आम का उत्पादन किया जाता है. इस क्षेत्र से लगभग प्रतिवर्ष 50 हजार टन आम संयुक्त अरब अमीरात और ओमान जैसे देशों को निर्यात किया जाता है. वहीं प्रयागराज मंडल में आम की फसल को बढ़ावा देने के लिए खुसरो बाग स्थित औद्योगिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र में लगातार आम की नई-नई वैरायटी की पौध तैयार की जाती है. यह पौधे नर्सरी से किसानों तक पहुंचाये जाते हैं. इसके बाद तीन से पांच साल के अंदर किसानों को अच्छी फसल मिलने लगती है.

(पंकज श्रीवास्तव की रिपोर्ट)

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