देश की सेना और हर सैनिक का सम्मान पूरा देश करता है. एक सैनिक की वर्दी सिर्फ कपड़ा नहीं होती, वो सम्मान होती है, बलिदान होती है, देशभक्ति की पहचान होती है. क्या आपको पता है कि जब कोई वर्दी रिटायर होती है तो उसका क्या होता है. इस सवाल का जवाब अब तक किसी फौजी के पास भी नहीं था लेकिन अब इसका एक जबरदस्त इंतजाम हो गया है.
वर्दी से बन रहे स्कूल बैग
दिल्ली के एक रिटायर्ड मेजर जनरल असीस कोहली ने इसी वर्दी को नया मिशन दे दिया है. उन्होंने 'वर्दी का सम्मान' नाम से एक नया मिशन शुरू किया है. वो पुरानी सैन्य वर्दियों से स्कूल बैग बना रहे हैं, जो मुफ्त में पहुंच रहे हैं देश की सरहद से सटे गांवों के बच्चों तक. शुरुआत कोविड के वक्त हुई थी. रिटायरमेंट के बाद खुद असीम के पास अपनी 12 जोड़ी वर्दी थी. कोविड के वक्त उनकी बेटी ने आइडिया दिया कि क्यों न इसे सोशल कॉल के लिए इस्तेमाल किया जाए. सबसे पहले इन वर्दी से मास्क बना. असीम की इस पहल में IIT DELHI सारथी बना.
क्या है सेवज नशीम का मतलब
मेजर जनरल असीस कोहली ने अपनी संस्था का नाम सेवज नशीम रखा है. आइए जानते हैं इस नाम का मतलब क्या है?
1. से मतलब सेना.
2. व मतलब वायुसेना.
3. ज मतलब जलसेना.
4. नशीम यानी जिसकी कोई सीमा न हो. देश सेवा बिना किसी सीमा के.
सेवज नशीम संस्था की ओर से पुरानी सैन्य वर्दियों को रिसाइकल कर मजबूत और टिकाऊ स्कूल बैग तैयार किए जाते हैं. ये बैग अधिकतर उन बच्चों को दिए जाते हैं, जो देश के सीमावर्ती इलाकों से सटे गांवों में पढ़ाई कर रहे हैं. ये बैग उन्हें मु्फ्त मिलते हैं.
फैक्ट्री से नहीं जवान के तन से आई है ये वर्दी, Indian Army का नाम काफी
इन वर्दियों की खास बात ये है कि ये किसी फैक्ट्री से सीधे नहीं आई हैं बल्कि ये वो वर्दियां हैं, जो एक जवान के तन से उतरी हैं. संभव है कि इन्हें पहनकर किसी सैनिक ने युद्ध या सैन्य ऑपरेशन में हिस्सा लिया हो. सेना ने खुद इन वर्दियों के इस्तेमाल की अनुमति संस्था को दी है. असीम कोहली कहते हैं वर्दी से सम्मान और इमोशन जुड़ा है. मैं इसे खुले बाजार में यूं ही नहीं बेचना चाहता. हमारे लिए सबसे बड़ा ब्रांड Indian Army है. हमें किसी और बड़े ब्रांड के नाम या टैग की जरूरत नहीं. हमने कई बड़े ब्रांड्स के साथ काम करने से इंकार किया है.
हर कतरन का सम्मान
यहां वर्दी का एक टुकड़ा भी बेकार नहीं जाता. बैग बनने के बाद जो कतरन बचती है, उनसे सॉफ्ट टॉय और दूसरी उपयोगी चीजें बनाई जाती हैं. इस मिशन को पर्यावरण से भी जोड़ा गया है. बैग बनाने में रिसाइकल प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है, जिसकी रीसाइक्लिंग कश्मीर में की जाती है. यानी ये पहल देश सेवा के साथ पर्यावरण संरक्षण भी कर रही है.
60% बैग दान
संस्था द्वारा तैयार किए गए 60 प्रतिशत बैग जरूरतमंद बच्चों को दान कर दिए जाते हैं. खासकर देश की सरहद से सटे गांवों के बच्चों को. इसके बाद बाकी बैग सिर्फ वॉर मेमोरियल की सोविनियर में रखकर बेचे जाते हैं. खुले बाजार में इनकी बिक्री नहीं की जाती. वर्दी भले बदल जाए लेकिन देश सेवा की भावना नहीं बदलती. असीम कोहली 5 साल में 40 हजार वर्दी का इस्तेमाल कर चुके हैं. वो कहते हैं कि हम इस काम में सिर्फ उन्हीं लोगों को जोड़ना चाहते हैं जो CSR के फंड से इसमें मदद कर सकें ताकि देश सेवा और समाज सेवा की भावना बनी रहे.