उत्तर प्रदेश के सहारनपुर नगर निगम के मां शाकंभरी कान्हा गौशाला में गोवंश संरक्षण के साथ कई अनूठे प्रयोग किए जा रहे हैं. गौशाला में गाय के शुद्ध गोबर से 15 अगस्त के लिए तिरंगा चेस्ट बैज और रक्षाबंधन के लिए राखियां तैयार की जा रही हैं. इन उत्पादों को ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से बेचा जा रहा है, जिनकी बाजार में अच्छी मांग देखने को मिल रही है. इस पहल के जरिए गोबर का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा दिया जा रहा है.
गौशाला को मिला है कई सम्मान-
मां शाकंभरी कान्हा गौशाला विश्व की इकलौती ऐसी गौशाला है, जिसको वर्ल्ड रिकॉर्ड सम्मान प्राप्त है. यह भारत की पहली ऐसी गौशाला है, जो GMT प्रमाण पत्र भी प्राप्त है. इसके अलावा गौशाला को ISO सर्टिफिकेशन और इंडिया बुक का रिकॉर्ड IVR अचीवर अवार्ड दिया है, यह सारे प्रमाण पत्र अवार्ड नवाचार के लिए हैं.
गोबर से तिरंगा चेस्ट बैज और राखी की जा रही तैयार-
नगर निगम के पशु कल्याण अधिकारी डॉ. संदीप कुमार मिश्रा के मुताबिक, मां शाकंभरी कान्हा गौशाला में वर्तमान में 547 गोवंश संरक्षित हैं. गौशाला में गोबर से तैयार किए जा रहे उत्पादों के नवाचार को कई सम्मान और रिकॉर्ड भी मिल चुके हैं. इसी क्रम में 15 अगस्त और रक्षाबंधन को देखते हुए इस बार 5 हजार तिरंगा चेस्ट बैज और राखियां तैयार की जा रही हैं. वर्ष 2024 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 1 हजार बैज बनाए गए थे, जबकि पिछले साल 3 हजार बैज तैयार किए गए थे.
गोबर से बने तिरंगा चेस्ट बैज की कीमत 10 रुपए-
गोबर से बनाए गए तिरंगा चेस्ट बैज की कीमत महज 10 रुपये रखी गई है. अधिकारियों का कहना है कि प्लास्टिक से बने बैज इस्तेमाल के बाद इधर-उधर फेंक दिए जाते हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने के साथ राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं. इसके मुकाबले गोबर से बने बैज पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल हैं. इस्तेमाल के बाद इन्हें गमले में डाला जा सकता है, जहां यह खाद का काम करेंगे. इस तरह देशभक्ति के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जा रहा है.
गोबर की राखियों की कितनी है कीमत?
वहीं, इस बार रक्षाबंधन के लिए तैयार की गई राखियों को भी तिरंगे का स्वरूप दिया गया है. जिस्म अलग-अलग डिजाइन और बच्चों के लिए भी कार्टून वाली राखियां तैयार की जा रही है. इनकी कीमत भी 10 रुपये रखी गई है और इन्हें ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों तरह से उपलब्ध कराया जा रहा है. खास बात यह है कि राखी के अंदर तुलसी का बीज डाला गया है. राखी का उपयोग करने के बाद इसे गमले या मिट्टी में लगाने पर तुलसी का पौधा उगाया जा सकता है. नगर निगम की यह पहल देशभक्ति, गोवंश से जुड़े संसाधनों के सदुपयोग और पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत अच्छी है.
ये भी पढ़ें: