Basant Panchami at Nizamuddin Dargah: हजरत निजामुद्दिन दरगाह की मशहूर है बसंत पंचमी... जानें क्या है 700 साल पुरानी परंपरा

जानें क्या है 700 साल पुरानी ये अनोखी परंपरा.

हजरत निजामुद्दिन दरगाह
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 22 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:39 PM IST

आपने 'हिरामंडी' वेब सीरीज का यह गाना तो सुना ही होगा, ‘सकल बन फूल रही सरसों’. अब आप सोच रहे होंगे कि इस गीत, बसंत पंचमी और हजरत निजामुद्दिन के बीच आखिर क्या कनेक्शन है? तो चलिए बताते हैं इस अनोखी परंपरा के पीछे छुपा एक खूबसूरत साम्प्रदायिक सच.

700 साल पुरानी है वह कहानी, जहां से शुरू हुई परंपरा
यह घटना करीब 700 साल पुरानी है. यह कहानी है अमीर खुसरो और उनके गुरु सूफी संत हजरत निजामुद्दिन औलिया के अटूट रिश्ते की. दोनों के बीच गहरा प्रेम था, मानो दोनों गुरु-शिष्य नहीं, बल्कि पिता और पुत्र जैसा हों.

एक समय हजरत निजामुद्दिन औलिया के भांजे की मृत्यु हो गई, जिसके बाद निजामुद्दिन गहरे दुख में डूब गए. उनकी उदासी अमीर खुसरो को भीतर तक कचोटती थी. वह लगातार सोचते रहते थे कि कैसे अपने गुरु के चेहरे पर फिर से मुस्कान लाई जाए. कहते हैं न 'Nature is the best healer' और यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया.

ऐसे शुरू हुआ दरगाह पर बसंत पंचमी का उत्सव
एक दिन खुसरो ने देखा कि कुछ लोग गाते-बजाते चले जा रहे हैं. वह सभी पीले कपड़े पहने हुए थे और खुशी के साथ एक त्योहार मना रहे थे. खुसरो ने उनसे पूछा कि वह कौन सा पर्व मना रहे हैं. तब उन्हें बताया गया कि यह बसंत पंचमी का त्योहार है. बस प्रकृति के इस अनोखे त्योहार में खुसरो को अपने गुरु को खुश करने का उपाय मिल गया.

सरसों के फूल, पीले कपड़े और एक गीत
अमीर खुसरो ने भी पीले वस्त्र पहने, दोनों हाथों में सरसों के फूल लिए और पूर्वी बोली में गीत गाते हुए एक जुलूस निकाल लिया.
वह गाने में इतने मग्न हो गए कि उन्हें पता ही नहीं चला कब वह गाते-गाते हजरत निजामुद्दिन औलिया के पास पहुंच गए.

जब निजामुद्दिन औलिया ने खुसरो को इस रूप में देखा, तो वह उन्हें किसी बच्चे की तरह लगे. अपने शिष्य की यह मासूम कोशिश देखकर उनकी आंखें आंसुओं से भर आईं और उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आई.

जहां से बनी एक परंपरा
खुसरो ने गुरु के चरणों में सरसों का फूल अर्पित किया. उसके बाद हजरत निजामुद्दिन औलिया भी इस उत्सव में शामिल हो गए. यहीं से दरगाह पर बसंत पंचमी मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई, जो आज तक निभाई जा रही है.

आज भी निभाई जाती है वही रिवायत
आज भी हजरत निजामुद्दिन औलिया की दरगाह पर बसंत पंचमी पूरे उत्साह के साथ मनाई जाती है. इस दिन पूरी दरगाह को पीले फूलों से सजाया जाता है. दरगाह में सूफी कविताएं और कव्वालियां गूंजती हैं. इन्हीं कविताओं में से एक है 'सकल बन फूल रही सरसों', जो बसंत पंचमी के त्योहार के ऊपर लिखी गई अमीर खुसरो की रचना है. इसी कविता को 'हिरामंडी' में एक गीत के रूप में फिल्माया गया. तभी से सांप्रदायिक एकता की मिसाल बन गया बसंत पंचमी का ये पीला त्योहार. 

 

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