मैनपुरी के आजाद खान की रुकी रही रिहाई
मैनपुरी के आजाद खान की रुकी रही रिहाई
उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले स्थित थाना अलाऊ के ज्योति कतारा निवासी आजाद खान को बेगुनाह होने के बावजूद अपनी जवानी के 24 साल जेल के अंदर गुजारने पड़े. डकैती के आरोप में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आजाद को हाई कोर्ट ने बेगुनाह पाया, लेकिन कागजी कार्रवाई और जुर्माने की रकम अदा नहीं करने के कारण आजाद खान की रिहाई में देरी हुई. आइए पूरा मामला जानते हैं.
पुलिस ठोस साक्ष्य नहीं कर सकी पेश
पुलिस ने आजाद खान को साल 2000 में डकैती के आरोप में गिरफ्तार किया था. अपर सत्र न्यायाधीश मैनपुरी ने धारा 395-397 के तहत आजाद खान को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. इस फैसले के खिलाफ आजाद के भाई मस्तान ने हाई कोर्ट में अपील की. मामला न्यायमूर्ति जे जे मुनीर के पास गया. हाई कोर्ट में अभियोजन पक्ष और पुलिस आजाद खान के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं दे सकी. न्यायमूर्ति जे जे मुनीर ने कहा कि अभियुक्त का इकबालिया बयान यानी अपने अपराध को स्वीकार करना सिर्फ काफी नहीं है. न्यायमूर्ति जे जे मुनीर ने 19 दिसंबर 2025 को आजाद खान को दोषमुक्त घोषित किया.
रिहाई में फंस गया पेच
हाई कोर्ट ने आजाद खान को दोषमुक्त करते हुए धारा 437 ए की कार्रवाई सत्र न्यायालय में संबंधित किए जाने के लिए निर्देशित किया था. इसमें आजाद खान को 20-20 हजार के दो जमानतदारों को पेश करना था. आजाद खान की आजादी के बीच धारा 437ए की कानूनी प्रक्रिया का पेच फंस गया. दरअसल, आजाद खान सत्र न्यायालय में जमानतदार पेश नहीं कर पाए. इसके कारण मैनपुरी कोर्ट से रिलीज ऑर्डर जारी नहीं हो सका. रिलीज ऑर्डर नहीं मिलने के कारण जेल प्रशासन ने आजाद खान को रिहा नहीं किया. बरेली केंद्रीय कारागार के सीनियर जेलर नीरज कुमार ने बताया कि आजाद खान पर पर एक अन्य मामले में भी केस दर्ज था. इस केस में कोर्ट की ओर से 7000 रुपए का जुर्माना लगाया गया था. जुर्माने की रकम अदा नहीं करने पर आजाद खान को एक साल जेल में रहना था. ऐसे में आजाद खान को डकैती के आरोप में बेगुनाह होने के बावजूद एक साल और जेल में रहना पड़ता.
जुर्माना नहीं भरने के चलते रहना पड़ा जेल में
उच्च न्यायालय द्वारा 19 दिसंबर 2025 को आजाद खान को दोषमुक्त करने के आदेश देने के बावजूद धारा 437ए की औपचारिकताएं और 7000 रुपए का जुर्माना न भर पाने के कारण आजाद को बरेली जेल में रहना पड़ा. 'आजतक' के संज्ञान में जब यह मामला आया तो उसने जांच-पड़ताल शुरू कर दिया. इसके बाद शासन से लेकर बरेली जेल प्रशासन तक में हड़कंप मच गया.
और इस तरह हुई आजाद खान की रिहाई
जेल सुपरिंटेंडेंट अविनाश गौतम ने देर न करते हुए तुरंत ई-मेल के जरिए न्यायालय से संपर्क किया. इसके बाद औपचारिकताएं पूरी करते हुए मैनपुरी सत्र न्यायालय और सरकारी वकील के प्रयास से आजाद खान की रिहाई के आदेश ई-मेल के जरिए बरेली के सेंट्रल जेल को भेजा गया. हालांकि आजाद खान की आजादी के बीच अभी एक अड़चन और थी. उनके घरवालों के पास जुर्माने के 7000 रुपए नहीं थे. जब यह बात सामने आई कि आजाद के पास जुर्माने के पैसे नहीं हैं, तब छोटी सी आशा संस्था की पारुल मलिक और रूपाली गुप्ता ने 7000 रुपए जमा किए. इसके बाद तुरंत बरेली सेंट्रल जेल से आजाद खान को उनके भाई मस्तान के सुपुर्द किया गया. आजाद की रिहाई में उनके भाई का भी बड़ा रोल रहा. आजाद के भाई मस्तान ने सालों तक मजदूरी करके हाई कोर्ट में केस की पैरवी की. 24 साल बाद जब आजाद घर लौटे तो परिवार में खुशी का ठिकाना नहीं रहा.
(रिपोर्ट- कृष्ण गोपाल राज)
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