अगर आप कभी किसी सरकारी कार्यालय में गए हैं, तो वहां एक चीज लगभग हर बड़े अधिकारी की सीट पर जरूर दिखी होगी. कुर्सी पर बिछा सफेद तौलिया. फाइलों से भरी मेज, स्टील की अलमारी, ऊपर घूमता पंखा और बीच में सफेद तौलिया लगी कुर्सी. यह दृश्य अब भारतीय सरकारी दफ्तरों की पहचान जैसा बन चुका है. जब आप इसे पहले बार देखे होंगे तो ये आपको कोई नियम लग सकता है, लेकिन इसके पीछे सुविधा, परंपरा और पद की पहचान से जुड़ी लंबी कहानी छिपी है.
सुविधा और जरूरत से हुई शुरुआत
इस चलन की शुरुआत उस समय से मानी जाती है, जब सरकारी दफ्तरों में आज जैसी आधुनिक सुविधाएं मौजूद नहीं थीं. एयर कंडीशनर, आरामदायक चेयर कवर और क्लाइमेट कंट्रोल जैसी चीजें आम नहीं थीं. गर्मी, धूल और लंबी दूरी तय करके दफ्तर पहुंचने वाले अधिकारी सीधे अपनी सीट पर बैठते थे.
ऐसे में कुर्सी पर रखा सफेद तौलिया बेहद काम आता था. यह पसीना सोखने में मदद करता था, कुर्सी को गंदा होने से बचाता था और जरूरत पड़ने पर चेहरे या गर्दन पोंछने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था. उस दौर में यह एक व्यावहारिक और जरूरी चीज मानी जाती थी.
बालों के तेल और दाग से बचाव
पुराने समय में बालों में तेल लगाने की आदत काफी सामान्य थी. अधिकारी और कर्मचारी अकसर तेल लगाकर दफ्तर पहुंचते थे. ऐसे में कुर्सी की बैकरेस्ट पर तेल के निशान और दाग पड़ने की संभावना बनी रहती थी. इसी वजह से सफेद तौलिया कुर्सी के पीछे लगाया जाने लगा, ताकि सीट साफ-सुथरी बनी रहे. तौलिया गंदा होने पर उसे आसानी से हटाकर धोया या बदला जा सकता था.
धीरे-धीरे बन गया रुतबे की पहचान
समय के साथ यह केवल सुविधा तक सीमित नहीं रहा. औपनिवेशिक दौर में दफ्तरों के भीतर हर चीज पद और रैंक को दिखाने का माध्यम होती थी. कमरे का आकार, मेज की बनावट, कुर्सी की गुणवत्ता और उस पर रखा तौलिया, सब कुछ कर्मचारियों के पद का संदेश देता था. धीरे-धीरे सफेद तौलिया लगी कुर्सी वरिष्ठ अधिकारियों की पहचान बन गई. बड़े अफसरों की सीट बाकी कुर्सियों से अलग दिखाई देती थी, जबकि मेहमानों और जूनियर कर्मचारियों को साधारण कुर्सियां दी जाती थीं. इसी कारण यह एक तरह से 'पावर सिंबल' और 'स्टेटस मार्क' भी बन गया.
अंग्रेज गए, पर यह परंपरा रह गई
कई पूर्व नौकरशाह भी इस परंपरा का जिक्र कर चुके हैं. अकसर मजाकिया अंदाज में कहा जाता है कि अंग्रेज तो चले गए, लेकिन उनकी कई प्रशासनिक परंपराएं अब भी बनी हुई हैं, जिनमें यह सफेद तौलिया भी शामिल है. आज भी कई सरकारी दफ्तरों में वरिष्ठ अधिकारियों की कुर्सियों पर सफेद तौलिया देखने को मिल जाता है. यह बताता है कि कुछ आदतें समय के साथ व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं.
सफेद रंग ही क्यों चुना गया?
सफेद रंग को हमेशा साफ-सफाई, अनुशासन और औपचारिकता का प्रतीक माना जाता है. इस पर जरा सा दाग भी तुरंत नजर आ जाता है, जिससे इसे समय-समय पर बदलना आसान रहता है. यही वजह है कि अधिकतर सरकारी कार्यालयों में सफेद रंग का ही तौलिया इस्तेमाल होता है. इससे सीट साफ भी दिखती है और एक औपचारिक लुक भी बना रहता है.
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