8वीं पास फर्जी डॉक्टर, 60 से ज्यादा मामले... अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा

उत्तर प्रदेश के कानपुर में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट का खुलासा हुआ है. अब तक 60 से ज्यादा मामले सामने आए हैं. आशंका है यह नेटवर्क सिर्फ कानपुर तक ही सीमित नहीं है, इसका दायरा दूसरे शहरों तक फैला हो सकता है.

Kanpur News
gnttv.com
  • कानपुर,
  • 01 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:32 PM IST

उत्तर प्रदेश के कानपुर में उजागर हुए अवैध किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट ने चिकित्सा प्रणाली और मानवीय मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. जांच में अब तक 60 से ज्यादा ट्रांसप्लांट सामने आ चुके हैं. आशंका है कि यह नेटवर्क सिर्फ कानपुर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और अन्य शहरों तक फैला हुआ है, जिसमें बड़े अस्पताल और बाहरी राज्यों के डॉक्टर भी शामिल हो सकते हैं.

एक साल पहले पुलिस को लगी थी भनक-
पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल के अनुसार, इस गिरोह की भनक पुलिस को पिछले वर्ष ही लग गई थी. लगातार निगरानी के बावजूद मुख्य लोकेशन तक पहुंचना आसान नहीं था. कार्रवाई की पहली बड़ी कड़ी तब सामने आई जब ‘आरोही हॉस्पिटल’ को सील किया गया. इसके बाद जांच का दायरा बढ़ते हुए ‘आहूजा हॉस्पिटल’ तक पहुंच गया, जहां से कई अहम सुराग मिले.

8वीं पास शख्स बना 'फर्जी डॉक्टर'-
इस पूरे नेटवर्क का सबसे चौंकाने वाला किरदार शिवम अग्रवाल उर्फ काना है. महज आठवीं तक पढ़ा यह व्यक्ति एम्बुलेंस चालक था, लेकिन खुद को डॉक्टर बताकर मरीजों को जाल में फंसाता था. गले में स्टेथोस्कोप डालकर वह भरोसा जीतता और फिर उन्हें अवैध ट्रांसप्लांट के लिए तैयार करता था. उसकी गिरफ्तारी के बाद पूरे रैकेट की परतें खुलनी शुरू हुईं.

टेलीग्राम के जरिए होता था सौदा-
जांच में यह भी सामने आया कि मेरठ का डॉक्टर अफजाल इस रैकेट का डिजिटल संचालन करता था. उसने टेलीग्राम पर एक ग्रुप बना रखा था, जहां डोनर और रिसीवर के बीच डील तय होती थी. मेरठ की पारुल तोमर, जिनकी दोनों किडनियां खराब थीं, रिसीवर के रूप में सामने आईं.

बिहार के समस्तीपुर का आयुष, जो MBA अंतिम वर्ष का छात्र बताया गया, डोनर के रूप में जोड़ा गया. इसी प्लेटफॉर्म के जरिए पैसों और ऑपरेशन की पूरी योजना तैयार की जाती थी.

फिल्मी स्टाइल में किए जाते थे ऑपरेशन-
कानपुर में 40 से 50 अवैध सर्जरी होने का अनुमान है, जबकि एक विदेशी महिला का भी ट्रांसप्लांट किया गया. आहूजा हॉस्पिटल में ही 7-8 ऑपरेशन होने की बात सामने आई है. इनकी कार्यप्रणाली बेहद गोपनीय और योजनाबद्ध थी. ऑपरेशन के दिन अस्पताल का स्टाफ हटा दिया जाता था. एक विशेष टीम आकर सर्जरी करती थी. ऑपरेशन के तुरंत बाद मरीजों को अलग-अलग जगह शिफ्ट कर दिया जाता था. किसी भी मरीज का रिकॉर्ड या मेडिकल हिस्ट्री दर्ज नहीं की जाती थी.

अब तक का एक्शन-
पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें अस्पताल संचालक, डॉक्टर और अन्य सहयोगी शामिल हैं. यह कार्रवाई इस बात की ओर इशारा करती है कि नेटवर्क काफी बड़ा और संगठित था. इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. एक एम्बुलेंस चालक का डॉक्टर बनकर बड़े स्तर पर सर्जरी करवाना सिस्टम की बड़ी खामी को उजागर करता है. फिलहाल पुलिस फरार आरोपियों की तलाश में जुटी है.

(सिमर चावला की रिपोर्ट)

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