सहारनपुर में पशु-पक्षियों का अनोखा परिवार…70 साल के राजेंद्र अटल ने दर्द को समझकर बना दिया मिनी जू, पहले खिलाते हैं उन्हें खाना फिर खुद करते हैं भोजन

राजेंद्र अटल पिछले 25 से 30 वर्षों से इस कार्य में जुटे हैं. उनके पास कुछ पशु-पक्षी 20-25 साल पुराने भी हैं. वे अपने परिवार के साथ पहले पशु-पक्षियों को अपने हाथों से खाना खिलाते हैं, उसके बाद स्वयं भोजन करते हैं.

Rajendra Atal
राहुल कुमार
  • सहारनपुर,
  • 17 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:53 PM IST

सहारनपुर के 70 वर्षीय राजेंद्र अटल ने पशु-पक्षियों के प्रति ऐसा प्रेम दिखाया है, जो उन्हें एक अलग पहचान देता है. जहां इंसान अपना दर्द बयान कर सकता है, वहीं बेजुबान जानवर अपना दर्द कह नहीं पाते. राजेंद्र अटल कहते हैं कि उन्होंने इसी दर्द को महसूस किया और उसे अपना मिशन बना लिया. आज उनके पास गाय, खरगोश, बिल्लियां, कबूतर, मछलियां, कुत्ते और मुर्गों सहित कई तरह के पशु-पक्षियों का बड़ा परिवार है. उन्हें यह प्रेरणा राजाजी नेशनल पार्क में घूमते समय मिली, जब उन्होंने देखा कि कई जीव संरक्षण के अभाव में अपनी जान गंवा देते हैं. तभी से उन्होंने ठान लिया कि जितना संभव हो सके, वे जीवों को बचाकर उनका पालन-पोषण करेंगे.

30 साल से इस काम में जुटे
राजेंद्र अटल पिछले 25 से 30 वर्षों से इस कार्य में जुटे हैं. उनके पास कुछ पशु-पक्षी 20-25 साल पुराने भी हैं. वे अपने परिवार के साथ पहले पशु-पक्षियों को अपने हाथों से खाना खिलाते हैं, उसके बाद स्वयं भोजन करते हैं. उनका मानना है कि पर्यावरण केवल पेड़-पौधों तक सीमित नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और समस्त जीव-जंतुओं का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है. उन्होंने ऐसी गायों को बचाया जो कटान के लिए ले जाई जा रही थीं. विदेशी नस्ल की मुर्गियां, खरगोश, देसी और पर्शियन बिल्लियां, अलग-अलग रंगों के कबूतर और रंगीन मछलियां उनके संरक्षण में हैं. उनका कहना है कि इन जीवों की सेवा से उन्हें आत्मिक शांति और सच्ची खुशी मिलती है.

Rajendra Atal

अपने घर को बना दिया है मिनी जू
राजेंद्र अटल ने अपने स्थान को एक मिनी जू का रूप दे दिया है, जहां बच्चों और बड़ों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. उनके पास मोर की तरह पंख फैलाकर नाचने वाले कबूतर, सिर पर चोटी और पैरों में पंखों वाले दुर्लभ कबूतर, 18 साल तक की आयु वाले मुर्गे, चार-पांच फुट लंबी पूंछ वाला विशेष मुर्गा, टर्की, तीतर और जापानी बटेर भी हैं. देसी सफेद खरगोश बच्चों के साथ खेलते हैं और हाथ से दाना खा लेते हैं. एक बीघा में बने बड़े तालाब में लाल, सफेद, काली और अन्य रंगों की मछलियां तैरती नजर आती हैं, जो अब डेढ़ से दो फुट तक की हो चुकी हैं. यहां आने वाले दर्शक पशु-पक्षियों को दाना खिलाते हैं, फोटो और वीडियो बनाते हैं और आनंद का अनुभव करते हैं.

पशु-पक्षी भी इंसानों की तरह भावनाएं रखते हैं
राजेंद्र अटल का कहना है कि यदि किसी जीव की मृत्यु हो जाए तो उन्हें गहरा दुख होता है, क्योंकि वे उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानते हैं. उनका विश्वास है कि पशु-पक्षी भी इंसानों की तरह भावनाएं रखते हैं और उनकी देखभाल करना हमारा कर्तव्य है. ठंड के मौसम में वे रात में भी उठकर पशुओं की चिंता करते हैं कि कहीं उन्हें ठंड न लग रही हो. उनके इस समर्पण को देखकर कई अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी उनके प्रयासों की सराहना कर चुके हैं. राजेंद्र अटल की यह पहल समाज को यह संदेश देती है कि यदि इंसान संवेदनशील हो जाए, तो बेजुबान जीवों की दुनिया भी सुरक्षित और खुशहाल बन सकती है.

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