भारत में शादी एक पवित्र बंधन है, जिसमें महिला और पुरुष, परिवार, संस्कृतियों, सामाजिक और कानूनी नियमों के तहत एक-दूसरे के साथ सुख-दुख साझा करने और जिम्मेदारियों को निभाने के लिए जुड़ते हैं. लेकिन वक्त के साथ लोगों की सोच बदल रही है. भारत में जेन एक्स की बात करें तो उनके लिए शादी या विवाह एक स्थिर और सच्चा बंधन है, जो जीवन के संघर्षों में साथ निभाता है. लेकिन मिलेनियल्स के बाद जेन-जी और जेन-अल्फा की एक बड़ी आबादी भी अब शादी को जीवन का जरूरी पड़ाव नहीं, बल्कि एक विकल्प मान रही है. वहीं, जेन अल्फा यानी करीब डेढ़ दशक पहले जन्मी नई पीढ़ी भी अपनी सोच और प्राथमिकताओं को लेकर अपनी पहले की पीढ़ियों से ज्यादा स्पष्ट और साफ नजर आती है.
शादी को लेकर बदल रही सोच-
हाल ही में ब्रिटेन में हुए एक सर्वे में ये सामने आया है कि जेन अल्फा पीढ़ी पारंपरिक लाइफ स्टाइल, खासकर शादी और बच्चों को लेकर बहुत एक्साइटेड नहीं है. कम उम्र में ही ये पीढ़ी समझने लगी है कि वो अपनी जिंदगी में क्या नहीं चाहते, और यही बात उन्हें पिछली पीढ़ियों से बहुत ज्यादा अलग बनाती है.
ब्रिटेन में सर्वे में जहां किशोरों ने कहा कि भविष्य में शादी करना उनके लिए जरूरी नहीं है. वहीं, भारत में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिल रही है. यहां सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हर चार में से एक युवा के लिए शादी कोई च्वॉइस नहीं है. भारत की कुल जनसंख्या का एक चौथाई से अधिक हिस्सा जेन अल्फा का है. रिसर्च संस्थाओं यूगोव और रुकम कैपिटल की जेन अल्फा डिकोडेड की रिपोर्ट के मुताबिक जेन अल्फा की खासियत सिर्फ डिजिटल पहुंच ही नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल मैच्योरिटी भी है. रिपोर्ट कहती है कि जेन अल्फा के 10 में से 7 युवाओं ने पैसे कमाने को प्राथमिकता बताया. वहीं, 66 फीसदी जेन अल्फा बच्चे घर में रोजमर्रा के फैसलों को भी प्रभावित करते हैं. भारत में ये पीढ़ियां शादी को जीवन का जरुरी डेस्टिनेशन न मानकर एक ऑप्शन मानती हैं.
पीढ़ी दर पीढ़ी शादी को लेकर नजरिया-
भारत की जेन जी और जेन अल्फा पीढ़ी की शादी को लेकर सोच पिछली पीढ़ियों से एकदम अलग है. अगर हम पिछले आंकड़ों पर नजर डालें, तो शादी को लेकर दिलचस्पी हर पीढ़ी के साथ घटती गई है. भारत में जहां बेबी बूमर्स में लगभग 96 प्रतिशत लोगों ने शादी की, वहीं जेन एक्स में ये आंकड़ा 82 प्रतिशत और मिलेनियल्स में 67 प्रतिशत तक गिर गया. जेन जी में ये करीब 56-58 प्रतिशत है और अब माना जा रहा है कि जेन अल्फा में ये और कम हो सकता है.
दरअसल भारत में शादी को पुरुषों और महिलाओं के लिए एक ऐसा अहम लक्ष्य माना जाता है. जिसे हासिल करना दोनों के लिए जरुरी है. वहीं, ये भी कहना शायद गलत नहीं होगा कि पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर शादी करने का ज्यादा दबाव होता है. समाज एक निश्चित उम्र के बाद अविवाहित रहने वाले लोगों को और विशेषकर महिलाओं को लेकर समभाव नहीं है.
महिलाओं की नई सोच-
अगर 2011 की जनगणना के डेटा देखें तो देश में सिंगल महिलाओं की संख्या 7 करोड़ से ज्यादा थी जो मौजूदा जनगणना में 10 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. इसमें बड़ी संख्या उन महिलाओं की है, जिन्होंने अपनी मर्जी से शादी नहीं की है और करना भी नहीं चाहतीं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2011 से 2019 तक 9 सालों में शादी न करने का फैसला लेने वाली महिलाओं की संख्या 48 फीसदी बढ़ गई है.
इसके पीछे ये दलील दी जाती है कि शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता ने महिलाओं की सोच बदली है. अब वो ऐसे रिश्ते चाहती हैं, जहां समझौता कम और समानता ज्यादा हो. साथ ही वो रिश्ते में रुढ़िवादी या बहुत ज्यादा मर्दाना व्यवहार नापसंद कर रही हैं.
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