Advertisement

78 साल के गोपाल दादा 30 सालों से हवा महल के पास राहगीरों को पिला रहे ठंडा पानी, बिना किसी लालच के निभा रहे 'प्याऊ' की परंपरा, देखकर भावुक हो जाएंगे आप

सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक गोपाल दादा हवामहल के पास राहगीरों को पानी पिलाते हैं. ऑटो-टैक्सी ड्राइवर, डिलीवरी बॉय, मजदूर, पर्यटक या फिर सड़क से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति...दादा सबको अपने हाथों से ठंडा पानी पिलाते हैं.

Gopal Dada
रिदम जैन
  • जयपुर,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 3:16 PM IST

जयपुर की झुलसा देने वाली गर्मी में जहां लोग दोपहर के समय घरों से निकलने से बचते हैं, वहीं गुलाबी नगरी की सड़कों पर एक चेहरा ऐसा भी है जो पिछले 30 सालों से बिना रुके लोगों की प्यास बुझा रहा है. 78 वर्षीय गोपाल दादा हर दिन हवामहल के पास एक मटका और सैकड़ों लीटर पानी लेकर बैठ जाते हैं. ना कोई बोर्ड, ना कोई दान पेटी, ना किसी से कोई सवाल… बस एक ही मकसद, गर्मी में कोई प्यासा ना रहे. भागती-दौड़ती जिंदगी में जहां लोग अक्सर एक-दूसरे के लिए रुकना भूल जाते हैं, वहां गोपाल दादा इंसानियत की ऐसी मिसाल पेश कर रहे हैं जो लोगों को पुराने दौर की 'प्याऊ' संस्कृति की याद दिला रही है.

राहगीरों को पिलाते हैं पानी
सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक गोपाल दादा हवामहल के पास राहगीरों को पानी पिलाते हैं. ऑटो-टैक्सी ड्राइवर, डिलीवरी बॉय, मजदूर, पर्यटक या फिर सड़क से गुजरने वाला कोई भी व्यक्ति...दादा सबको अपने हाथों से ठंडा पानी पिलाते हैं. दादा बताते हैं कि वह रोज करीब 400 लीटर पानी लेकर आते हैं ताकि गर्मी में किसी को प्यासा ना रहना पड़े. उनका कहना है, 'प्यास सबको लगती है, पानी जरूर पिलाना चाहिए.' यही सोच उन्हें हर दिन इस सेवा के लिए प्रेरित करती है. तेज धूप और तपती सड़क के बीच जब किसी को उनके हाथ से पानी का गिलास मिलता है तो वह सिर्फ पानी नहीं, बल्कि राहत, अपनापन और इंसानियत का एहसास भी होता है.

पिता की शुरुआत को आगे पढ़ा रहे गोपाल दादा
गोपाल दादा बताते हैं कि इस सेवा की शुरुआत उनके पिताजी ने की थी. बचपन से उन्होंने अपने पिता को लोगों को पानी पिलाते देखा और फिर धीरे-धीरे यह जिम्मेदारी उन्होंने खुद संभाल ली. अब उन्हें यह काम करते हुए करीब 30 साल हो चुके हैं. हर साल गर्मियों के छह महीने वह इसी तरह रोजाना प्याऊ लगाते हैं. दादा कहते हैं कि उन्हें इससे कोई फायदा नहीं चाहिए, बस दिल को सुकून मिलता है कि उनकी वजह से किसी की प्यास बुझ रही है. आज जब शहरों में पारंपरिक प्याऊ धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, तब गोपाल दादा जैसी शख्सियतें इस परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं.

चुपचाप कर रहे सेवा का काम
सोशल मीडिया और आधुनिक जिंदगी के दौर में जहां इंसानियत अक्सर खबरों और पोस्ट तक सीमित रह जाती है, वहां जयपुर के गोपाल दादा चुपचाप सेवा का ऐसा काम कर रहे हैं जो बिना किसी प्रचार के लोगों के दिलों को छू रहा है. उनकी यह छोटी-सी पहल हर किसी को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे शहरों में अब भी ऐसी प्याऊ बची हैं? और अगर नहीं, तो क्या हम भी किसी की प्यास बुझाने जितनी छोटी लेकिन जरूरी शुरुआत कर सकते हैं.

 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Advertisement