आजकल जहां बाजार में मिलने वाले डिटर्जेंट और लिक्विड ने घर-घर में अपनी जगह बना ली है, बर्तन हों या कपड़े महिलाएं डिटर्जेंट और लिक्विड से साफ करती है. लेकिन क्या आपको पता है कि एक समय था जब गांव की महिलाएं डिटर्जेंट और लिक्विड के एक प्राकृतिक चीज से बर्तन धोती थी. ये प्राकृतिक चीज से बर्तन एकदम आईने की तरह चमक जाया करते थे. खास बात ये है कि यह तरीका न सिर्फ सस्ता था बल्कि पूरी तरह प्राकृतिक और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित भी था.
हम बात कर रहे हैं चूल्हे की राख और धान की भूसी के बारे में. ये बर्तन साफ कर उन्हें आइने की तरह चमका देते हैं. जी हां, पुराने समय में दादी-नानी चूल्हे में जलने वाली लकड़ी और उपलों से निकलने वाली राख को कभी बेकार नहीं जाने देती थीं. वे बर्तनों को इसी राख से साफ करती थीं. खास बात है कि, यह राख घरेलू कामकाज में सबसे ज्यादा काम आने वाली चीजों में शामिल थी.
कैसे करती थीं इस्तेमाल
बर्तन साफ करने के लिए महिलाएं राख में थोड़ा पानी मिलाकर गाढ़ा पेस्ट तैयार करती थीं. इस पेस्ट को पीतल, तांबे या स्टील के बर्तनों पर लगाकर हाथों या धान की भूसी की मदद से रगड़ा जाता था. कुछ ही मिनटों में बर्तनों पर जमी चिकनाई, कालिख और गंदगी साफ हो जाती थी और बर्तन बिल्कुल नए जैसे चमकने लगते थे.
ये कैसे करता है काम
दरअसल, राख में मौजूद प्राकृतिक क्षारीय तत्व चिकनाई को काटने का काम करती है, जिससे बर्तन आसानी से साफ हो जाते हैं. इस प्रक्रिया में न तो हाथ जलते हैं और न ही त्वचा को किसी प्रकार की एलर्जी या नुकसान होता है. यही कारण है कि इसे पूरी तरह सुरक्षित तरीका माना जाता था.
इस बात का ध्यान
इस तरीके में एक बात का खास ध्यान रखना जरूरी होता है कि पेस्ट लगे बर्तनों को सूखने के लिए न छोड़ा जाए. अगर पेस्ट लगाकर बर्तन छोड़ दिए जाएं, तो राख बर्तनों पर चिपक सकती है और बाद में उन्हें साफ करना मुश्किल हो सकता है. पेस्ट लगाते ही बर्तनों को गर्म पानी से धो लें. गर्म पानी से धोने पर बर्तनों में और ज्यादा चमक आ जाती है और वे लंबे समय तक साफ रहते हैं.
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