अगर आप किसी खूबसूरत पहाड़ी राज्य में जमीन खरीदकर घर, फार्म हाउस या होटल बनाने का सपना देख रहे हैं, तो पहले वहां के जमीन से जुड़े कानूनों को समझना जरूरी है. भारत के कई पहाड़ी राज्यों में राज्य के बाहर के लोगों के लिए जमीन खरीदने पर सख्त नियम लागू हैं. इन कानूनों का मकसद स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा करना, उनकी संस्कृति को सुरक्षित रखना, कृषि भूमि बचाना और पहाड़ी पर्यावरण को नुकसान से बचाना है. यही वजह है कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बाहरी लोगों के लिए जमीन खरीदना आसान नहीं है.
पहाड़ी राज्यों की अपनी अलग संस्कृति, परंपराएं और जीवनशैली है. सरकार का मानना है कि अगर बड़े पैमाने पर बाहरी लोग यहां जमीन खरीदेंगे, तो समय के साथ स्थानीय आबादी का संतुलन बदल सकता है. इससे पारंपरिक संस्कृति और सामाजिक पहचान पर भी असर पड़ सकता है. इसी कारण कई राज्यों ने भूमि खरीद पर प्रतिबंध या विशेष नियम बनाए हैं.
कृषि भूमि और पर्यावरण को बचाने की कोशिश
पहाड़ी इलाकों में खेती योग्य जमीन बहुत सीमित होती है. ऐसे में आशंका रहती है कि बाहरी निवेशक बड़े पैमाने पर जमीन खरीदकर होटल, रिसॉर्ट या फार्म हाउस विकसित कर सकते हैं. इससे स्थानीय किसानों के लिए कृषि भूमि की उपलब्धता कम हो सकती है. इसके अलावा हिमालयी क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है. अनियंत्रित निर्माण और व्यावसायिक विकास से भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ सकता है.
हिमाचल प्रदेश ने सबसे पहले बनाया कानून
हिमाचल प्रदेश ने वर्ष 1972 में हिमाचल प्रदेश किरायेदारी और भूमि सुधार अधिनियम की धारा 118 लागू की थी. इस कानून के तहत गैर हिमाचली और ऐसे हिमाचली निवासी जो कृषक नहीं हैं, उन्हें कृषि भूमि खरीदने की अनुमति नहीं है. हालांकि सरकार की विशेष मंजूरी मिलने पर बाहरी लोग सीमित क्षेत्रफल तक गैर कृषि या शहरी जमीन खरीद सकते हैं.
उत्तराखंड ने भी सख्त किए नियम
जनता की लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद उत्तराखंड सरकार ने 2024-25 के दौरान भूमि कानूनों को और सख्त बनाया. नए नियमों के अनुसार राज्य के बाहर के लोग उत्तराखंड के 13 पहाड़ी जिलों में से 11 जिलों में कृषि या बागवानी भूमि नहीं खरीद सकते. इन नियमों का उद्देश्य स्थानीय हितों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है.
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