आज के समय में बच्चों की लगभग हर मांग कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाती है. लेकिन मांग को पूरा करने से बीच भी उन्हें कुछ समझाने की जरूरत है. ऑनलाइन शॉपिंग और डिजिटल पेमेंट्स के दौर में बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि कौन सी चीज उनकी जरूरत है और कौन सी सिर्फ एक इच्छा. अगर मां-बाप बचपन से ही उन्हें सही फैसले लेने की सीख दें, तो वे बड़े होकर फाइनेंशियल रूप से अधिक जिम्मेदार बन सकते हैं.
बच्चों को इच्छा और जरूरत का फर्क समझाने के लिए मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है. उन्हें आसान उदाहरणों से समझाएं. जैसे खाना, पानी, कपड़े, घर और स्कूल की किताबें हमारी जरूरतें हैं क्योंकि इनके बिना जीवन पर काफी असर पड़ता है. वहीं वीडियो गेम, महंगे खिलौने, ब्रांडेड जूते या नए गैजेट्स इच्छाएं हैं, जिन्हें पाकर केवल खुशी मिलती है लेकिन इनके बिना भी जीवन को आसानी के जीया जा सकता है.
जब भी आप बच्चों के साथ बाजार, सुपरमार्केट या मॉल जाएं, तो उन्हें खरीदारी करने में शामिल करें. किसी सामान को टोकरी में रखने से पहले उनसे पूछें कि यह जरूरत है या इच्छा. इस तरह के छोटे-छोटे सवाल बच्चों को सोचने और फैसला लेने की आदत सिखाते हैं. धीरे-धीरे वे खुद समझने लगेंगे कि कौन सी चीज जरूरी है और कौन सी सिर्फ अट्रैक्ट होने का नतीजा.
अक्सर बच्चे किसी खिलौने, गैजेट या दूसरी चीज को देखकर तुरंत उसे खरीदने की जिद करने लगते हैं. ऐसे समय में फौरन मना करना ठीक नहीं रहेगा. ऐसे में आप '48 घंटे का नियम' अपना सकते हैं. बच्चे से कहें कि अगर उसे दो दिन बाद भी वही चीज चाहिए होगी, तब उसके बारे में सोचेंगे. ऐसे में कई बार बच्चों की अचानक जागी इच्छा कुछ समय बाद अपने आप खत्म हो जाती है और वे उस चीज को भूल जाते हैं.
बच्चों को पॉकेट मनी देनी की आदत डालें. इससे वह बचत करना सीख सकेंगे. घर में गुल्लक या पिग्गी बैंक रखें और उन्हें अपनी इच्छाओं के लिए पैसे बचाने के लिए मोटिवेट करें. जब बच्चा किसी पसंदीदा चीज़ के लिए खुद पैसे जमा करता है, तो उसे पैसों की कीमत बेहतर तरीके से समझ आती है.
बच्चों माता-पिता से भी काफी कुछ सीखते हैं. अगर माता-पिता सोच-समझकर खर्च करते हैं और जरूरत को प्राथमिकता देते हैं, तो बच्चे भी वही आदत अपनाते हैं. इसलिए बच्चों को सिखाने से पहले खुद अच्छा उदाहरण बनना जरूरी है.