जल्द दिल्ली की सड़कों से कम होगा धुआं? जानिए 'स्मॉग खाने वाली' ये नई तकनीक क्या है

अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो इस तकनीक का इस्तेमाल शहर की कई जगहों पर किया जा सकता है. जैसे कंक्रीट और डामर की सड़कें, इमारतों की दीवारें, कांच और धातु की सतहें, यहां तक कि छतों और स्ट्रीट लाइट्स पर लगे पैनल्स पर भी.

smog in delhi (Photo Generated by Grok)
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:34 AM IST
  • दिल्ली की सड़कें खा जाएंगी स्मॉग?
  • हवा को साफ करने के लिए दिल्ली में अपनाई जा रही अनोखी तकनीक

दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए सरकार ने IIT Madras के साथ मिलकर एक ऐसे प्रोजेक्ट की शुरुआत की है, जिसमें सड़कों और इमारतों को ही एयर प्यूरीफायर बनाने की कोशिश की जाएगी. अगर यह योजना सफल होती है, तो आने वाले समय में दिल्ली की सड़कें खुद ही हवा को साफ करने में मदद कर सकती हैं.

क्या है स्मॉग खाने वाली तकनीक?
इस प्रोजेक्ट में स्मॉग-ईटिंग सरफेस लगाए जाएंगे यानी ऐसी सतहें जो हवा में मौजूद जहरीले तत्वों को कम कर सकें. इसके तहत सड़कों, फुटपाथ, इमारतों और दूसरी जगहों पर एक खास तरह की कोटिंग लगाई जाएगी. यह कोटिंग हवा में मौजूद प्रदूषकों को तोड़कर उन्हें कम नुकसानदेह बना देती है.

यह तकनीक काम कैसे करती है?
यह पूरी प्रक्रिया फोटोकैटेलिसिस नाम की तकनीक पर आधारित है. इस कोटिंग में टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO₂) नाम का पदार्थ होता है. जब इस पर सूरज की रोशनी पड़ती है, तो यह एक्टिव हो जाता है और हवा में मौजूद हानिकारक गैसों जैसे नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) को कम नुकसानदेह पदार्थों में बदल देता है. आसान शब्दों में कहें तो ये सतहें बिना बिजली के लगातार हवा को साफ करने का काम कर सकती हैं.

कहां-कहां होगा इसका इस्तेमाल?
अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो इस तकनीक का इस्तेमाल शहर की कई जगहों पर किया जा सकता है. जैसे कंक्रीट और डामर की सड़कें, इमारतों की दीवारें, कांच और धातु की सतहें, यहां तक कि छतों और स्ट्रीट लाइट्स पर लगे पैनल्स पर भी.

कितना समय लगेगा?
इस प्रोजेक्ट की शुरुआत एक पायलट स्टडी के रूप में की गई है, जो लगभग 6 महीने तक चलेगी. पहले वैज्ञानिक इसे लैब में टेस्ट करेंगे, फिर दिल्ली की असली परिस्थितियों में इसकी जांच की जाएगी. इस दौरान यह देखा जाएगा कि यह तकनीक कितनी असरदार है, कितनी टिकाऊ है और बड़े स्तर पर इसे लागू करना कितना खर्चीला होगा. हालांकि सड़कें स्मॉग खा जाएंगी सुनने में काफी दिलचस्प लगता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई जादुई समाधान नहीं है. इसकी सफलता सूरज की रोशनी, ट्रैफिक और मौसम पर भी निर्भर करेगी. दुनिया के कुछ देशों में इस तकनीक का इस्तेमाल हो चुका है, लेकिन इसके परिणाम हर जगह अलग-अलग रहे हैं.

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